चार्वाक दर्शन (संकलनकर्ता:- विष्णु चंद गौड़ सहायक आचार्य दर्शन शास्त्र एम. एस. जे. कॉलेज भरतपुर)
चार्वाक दर्शन
चार्वाक का जड़वाद या भौतिकतावाद अवैदिक
दर्शनों में सबसे प्राचीन है।
भारतीय दर्शन में यह एकमात्र जड़वादी या
भौतिकतावादी दर्शन है।
ज्ञानमीमांसा या प्रमाण-विज्ञान (Epistemology): ज्ञानमीमांसा
दर्शनशास्त्र की एक प्रमुख शाखा है जिसमें ज्ञान के स्रोत,
ज्ञान के स्वरूप, ज्ञान
के लक्ष्य, ज्ञान की संभावना, ज्ञान का विकास, सीमा,
प्रमाणिकता, ज्ञाता-ज्ञेय संबंध इत्यादि की विवेचना की जाती है।
तत्वमीमांसा या तत्व-विज्ञान (Metaphysics): तत्वमीमांसा दर्शनशास्त्र की एक प्रमुख
शाखा है जिसमें (1) विश्व के मूल तत्व (Original Stuff) या
आदि कारण (First cause) के स्वरूप एवं
(2) मूल तत्व की संख्या की विवेचना की जाती है। यहाँ पहला पक्ष सत्ता जहां मूल तत्व
की प्रकृति के विषय में हैं, वहीं दूसरा पक्ष उसके परिमाण या संख्या के विषय में
है।
जड़वाद या भौतिकतावादः
जीवन और जगता के मूल तत्व के रूप में जड या भौतिक तत्व की सत्ता मानने वाला
सिद्धान्त जडवाद कहलाता है।
लोकायत: चार्वाक मत को
लोकायत दर्शन भी कहा जाता है। लोक (संसार) में जनसाधारण में विस्तारित होने या इसी
लोक को एकमात्र सत्य मानने के कारण यह लोकायत कहा गया है।
स्वभाववाद: जड़
तत्वों में निहित स्वभाव से जगत की उत्पत्ति मानने वाला सिद्धान्त स्वभाववाद कहलाता
है। चार्वाक इसका समर्थन करता है।
आकस्मिकतावाद:
जगत जड़ तत्वों के आकस्मिक संयोग का परिणाम है इस रूप में विश्व
प्रक्रिया प्रयोजन विहीन है। चार्वाक यंत्रवाद (Mechanism)
का समर्थन करते हैं।
देहात्मवाद (शरीरात्मवाद) :
देह को ही आत्मा मानने अर्थात् दोनों में अभेद मानने के कारण चार्वाक देहात्मवादी हैं।
चार्वाक मतानुसार चेतना से विशिष्ट शरीर ही आत्मा है।
भूत चैतन्यवाद:
भूत तत्व या जड तत्व से ही चेतना का उत्पत्ति मानने वाला सिद्धान्त।
नास्तिक शिरोमणि: माधवाचार्य द्वारा रचित 'सर्वदर्शन' संग्रह म चार्वाक दर्शन को 'नास्तिक शिरोमणि' कहा गया है। चार्वाक ईश्वर, नित्यात्मा और परलोक तीनों का खण्डन करता है।(वेदनिन्दको नास्तिक:)।
'ज्ञानमीमांसा
या ज्ञान का सिद्धान्त' (Theory of Knowledge)
चार्वाक दर्शन में ज्ञानमीमांसा प्राथमिक है।
चार्वाक सर्वप्रथम ज्ञान की मीमांसा करते हैं, और तत्पश्चात् अपने ज्ञानमीमांसीय
मान्यताओं के आधार पर तत्वमीमांसा एवं नीतिशास्त्र को स्थापित करते हैं।
ज्ञानमीमांसा --->
तत्वमीमांसा --> नीतिशास्त्र
ज्ञानमीमांसा का एक मुख्य प्रश्न यह है कि
हमारे यथार्थ ज्ञान का साधन क्या है? भारतीय दर्शन में यथार्थ ज्ञान (प्रमा)
के साधन को प्रमाण कहा गया है। दूसरे शब्दों में, जिस साधन के द्वारा प्रमाता
(ज्ञाता) प्रमेय (ज्ञेय) का ज्ञान प्राप्त करता है, उसे प्रमाण कहते हैं।
विभिन्न दर्शनों में प्रमाणों की संख्या के संदर्भ में मतभेद है। चार्वाक विभिन्न
प्रमाणों में से केवल प्रत्यक्ष को प्रमाण के रूप में स्वीकार करता है तथा अन्य
प्रमाणों (अनुमान, शब्द आदि) की प्रामणिकता का खंडन करता है।
ज्ञानमीमांसा
की दृष्टि से चार्वाक प्रत्यक्षवादी है अर्थात् चार्वाक मत में प्रत्यक्ष ही
एकमात्र प्रमाण है। (प्रत्यक्षमेव प्रमाणम)। यथार्थ ज्ञान प्राप्ति के
साधन या स्रोत के रूप में चार्वाक केवल प्रत्यक्ष को स्वीकार करते हैं। जो
ज्ञान इन्द्रिय और विषय (अर्थ) के सन्निकर्ष से उत्पन्न होता है उसे प्रत्यक्ष कहा
जाता है। चूंकि ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच हैं। इसलिए यहाँ पंचविध इन्द्रिय
प्रत्यक्ष स्वीकार किया गया है।
चार्वाक द्वारा प्रत्यक्ष को ही एकमात्र प्रमाण
मानने का कारण इस प्रमाण में विद्यमान विश्वसनीयता, अभ्रान्तता, एवं निश्चयात्मकता है जो प्रत्यक्षेतर (प्रत्यक्ष
से भिन्न) प्रमाणों में सम्भव नहीं है। यही कारण है कि चार्वाक अनुमान, शब्द
आदि अन्य प्रमाणों की प्रामणिकता का खण्डन करते हैं। अन्य प्रमाणों के खण्डन के
लिये दिये गये तर्क ही प्रत्यक्ष को एकमात्र प्रमाण सिद्ध करने के आधार बनते हैं।
प्रत्यक्ष विचार
प्रत्यक्ष (Perception)
का शाब्दिक अर्थ है-जो आंखों के सामने हो (प्रति अक्ष)। परन्तु
चार्वाक मतानुसार ज्ञानेन्द्रियों (आंख, कान, नाक, जीभ और त्वचा) से प्राप्त ज्ञान
प्रत्यक्ष है। जब इन ज्ञानेन्द्रियों का पदार्थों के साथ सन्निकर्ष या संयोग होता
है, तब प्रत्यक्ष ज्ञान होता है
साष्ट है कि प्रत्यक्ष ज्ञान की प्रक्रिया के
लिये तीन बातों का होना आवश्यक है -
(1) इन्द्रिय (Sense
Organ), (2) पदार्थ (Object), (3) सन्निकर्ष
(Contact)
यहाँ उल्लेखनीय है कि चार्वाक केवल लौकिक
प्रत्यक्ष को ही प्रत्यक्ष के रूप में स्वीकार करता है। वे नैयायिकों द्वारा
स्वीकृत अलौकिक प्रत्यक्ष को स्वीकार नहीं करते।
चार्वाक का ज्ञानमीमांसीय विचार अन्य भारतीय
दार्शनिकों से भिन्न है। क्योंकि प्रत्यक्ष के साथ-साथ अनुमान, शब्द, उपमान आदि
विभिन्न प्रमाणों का विचार भारतीय प्रमाण विचार का एक प्रधान अंग है। जैसे - बौद्ध
एवं वैशेषिक दर्शन प्रत्यक्ष और अनुमान को; जैन और
सांख्य में प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द को; न्याय दर्शन ने प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द और उपमान को प्रमाण माना
है।
चूंकि चार्वाक की दृष्टि में प्रत्यक्ष ही
एकमात्र प्रमाण है, फलस्वरूप वह अपने मत के प्रतिपादन के लिए अनुमान तथा शब्द जैसे
प्रमाणों का खंडन करते है जिसे निम्नवत् प्रस्तुत किया जा सकता है।
अनुमान
प्रमाण का खंडन (Refutation of inference)
चार्वाक अनुमान को संदेहात्मक मानते हैं। अनुमान
दो शब्दों के योग से बना है- अनु और मान! यहां 'अनु' का अर्थ पश्चात् और 'मान' का
अर्थ ज्ञान है। अर्थात् अनुमान का शाब्दिक अर्थ पश्चात् ज्ञान से है। अनुमान के
अंतर्गत दृष्ट हेतु से अदृष्ट साध्य की सिद्धि होती है। जैसे पर्वत पर दृष्ट धूम
के ज्ञान से पर्वत पर अदृष्ट अग्नि का ज्ञान होना अनुमान है। अनुमान के लिए दो बात
आवश्यक है। पहला हेतु का पक्ष में होना और दूसरा हेतु और साध्य में व्याप्ति-संबंध
होना। व्याप्ति ज्ञान अनुमान का करण या साधन माना जाता है, क्योंकि अनुमान तर्कतः
इसी पर निर्भर करता है।
व्याप्ति का शाब्दिक अर्थ - विशेष संबंध है।
व्याप्ति हेतु एवं साध्य के मध्य का अनौपाधिक, नियत साहचर्य (Unconditional, invariable concomitance), सार्वभौम तथा अव्यभिचारी संबंध है, जैसे जहाँ-जहाँ धूम है वहां-वहां अग्नि अवश्य है।
चार्वाक अनुमान-खण्डन के क्रम में व्याप्ति का खण्डन
करते हैं।
1. चार्वाक मतानुसार अनुमान तभी असंदिग्ध हो
सकता है जब व्याप्ति वाक्य निश्चित एवं संशयरहित हो। परन्तु हेतु एवं साध्य के
मध्य नियत सार्वभौम संबंध की स्थापना किसी भी प्रकार से संभव नहीं है। भूत और भविष्य
की बात तो दूर, वर्तमान काल में भी संसार के
भिन्न-भिन्न भागों में सभी धूम-अग्नि संबंधों
का प्रत्यक्ष नहीं कर सकते। अतः सीमित प्रत्यक्ष के आधार पर हेतु एवं साध्य के
सार्वभौम संबंध (व्याप्ति) की निश्चयात्मक रूप से स्थापना नहीं कर सकते।
2. अनुमान
के द्वारा भी व्याप्ति संबंध की स्थापना नहीं की जा सकती क्योंकि जिस अनुमान के
द्वारा हम इसकी स्थापना करेंगे उसकी सत्यता भी व्याप्ति पर ही निर्भर होगी अर्थात्
व्याप्ति अनुमान पर निर्भर होगी और अनुमान व्याप्ति पर। इस तरह यहां आत्माश्रय दोष
(Petitio principii) उत्पन्न हो जाता
है।
3. व्याप्ति की स्थापना हम शब्द प्रमाण के
द्वारा भी नहीं कर सकते है क्योंकि स्वयं शब्द की प्रामणिकता अनुमान पर आधारित
होती है। ऐसी स्थिति में आत्माश्रय दोष की स्थिति उत्पन्न होती है। पुनः यदि
अनुमान को शब्द पर निर्भर माना जाए तो फिर कोई भी अपने-आप अनुमान नहीं कर सकता। उसे
अनुमान करने के लिए सदैव किसी विश्वसनीय व्यक्ति के वचन पर निर्भर रहना पड़ेगा । अतः
व्याप्ति को शब्द के द्वारा सिद्ध किया जाय तो फिर अनुमान स्वयं स्वतंत्र प्रमाण
नहीं रह पाएगा।
4. कतिपय
विचारकों की धारणा है कि व्याप्ति विशेषगत न होकर सामान्यगत अर्थात् धूमत्व और
अग्नित्व में व्याप्ति सम्वन्ध है। चार्वाक मतानुसार ऐसी स्थिति में इसमें सिद्धसाधन
दोष उत्पन्न हो जाता है और नए अनुमान की आवश्यकता नहीं रह जाती है। ऐसी स्थिति में
अनुमान की प्रक्रिया होगी;
जहां-जहां धूम है वहां वहां अग्नि है।
इस पर्वत पर धूम है।
अतः इस पर्वत पर अग्नि है।
उपरोक्त अनुमान में निष्कर्ष प्रथम आधार वाक्य
में ही सिद्ध हो चुका है अतः सिद्ध का पुनः साधन करना व्यर्थ है।
5. चार्वाक मतानुसार व्याप्ति की स्थापना
कार्य-कारण संबंध के आधार पर भी संभव नहीं है क्योंकि कार्य-कारण संबंध स्वयं एक
प्रकार की व्याप्ति है, क्योंकि यह भी कारण और कार्य के मध्य अनिवार्य और सामान्य
संबंध की बात करता है। अतः यदि कारणता सिद्धान्त पर व्याप्ति को सिद्ध करने का
प्रयास किया गया तो चक्रक दोष (Arguing in Circle) उत्पन्न
हो जायेगा। पुनः दो वस्तुओं को कई बार साथ-साथ देखकर हम कार्य-कारण संबंध की
स्थापना नहीं कर सकते है क्योंकि कई बार यह संबंध उपाधि पर निर्भर होता है जैसे
अग्नि को देखकर सदैव धूम का अनुमान सत्य नहीं होता क्योंकि धूम का होना या न होना इंधन
के आर्द्र होने पर निर्भर करता है। प्रत्यक्ष के द्वारा यह सिद्ध नहीं हो सकता कि
कोई व्याप्ति उपाधि रहित है, क्योंकि प्रत्यक्ष सर्वव्यापक नहीं हो सकता है, उसका
क्षेत्र सीमित है। उपाधि निरास के लिए अनुमान या शब्द की सहायता लेना भी उचित
नहीं, क्योंकि वे स्वयं प्रमाण की कोटि में नहीं आता। संक्षेप में, व्याप्ति की
अनौपाधिकता या शर्त रहितता की सिद्धि प्रत्यक्ष के आधार पर नहीं की जा सकती।
शब्द प्रमाण का खंडन
1. चार्वाक शब्द को भी प्रमाण नहीं मानते हैं।
शब्द को इसलिए प्रमाण माना जाता है क्योंकि वह आप्त पुरुषों या विश्वसनीय व्यक्तियों
का कथन होता है। चार्वाक मतानुसार शब्द से ज्ञान प्राप्ति अनुमान पर आश्रित होती
है जैसे-
सभी विश्वसयोग्य व्यक्तियों के वाक्य मान्य है।
यह विश्वासयोग्य व्यक्ति का वाक्य है।
अतः यह मान्य है।
चार्वाक मतानुसार 'कोई व्यक्ति आप्त पुरुष है'
या 'आप्त पुरुष का कथन विश्वास करने योग्य है' यह अनुमान पर आधारित है। चूंकि अनुमान
स्वयं प्रमाण नहीं है, अतः अनुमान पर
आधारित शब्द भी प्रमाण नहीं है।
2. चार्वाक वेदों को भी प्रमाण नहीं मानते।
उनके अनुसार वेद अनेकार्थकता, असंगति और
पुनरूक्ति के दोषों से भरे हैं। इसमें स्वर्ग, नरक, आत्मा आदि अतिन्द्रिय विषयों
का वर्णन है। इसकी रचना स्वार्थी लोगों द्वारा अपनी जीविका का प्रबंध करने के लिए
किया गया है।
उपमान प्रमाण का खंडन
चार्वाक दार्शनिक उपमान की प्रमाणिकता को भी
खण्डित करते हैं। चूंकि उपमान का आधार सादृश्य ज्ञान है, और सादृश्यता का ज्ञान प्रत्यक्ष से
होता है। अतः चार्वाक इसके लिए प्रत्यक्ष से भिन्न किसी स्वतन्त्र प्रमाण (उपमान की
आवश्यकता का निषेध करते हैं
इस प्रकार चार्वाक अनुमान, शब्द और उपमान की प्रामणिकता
का खंडन करते है। इसके फलस्वरूप यहाँ प्रत्यक्ष ही एकमात्र प्रमाण के रूप में बचता
है। चार्वाक की यह प्रत्यक्षवादी ज्ञानमीमांसा तत्वमीमांसा के क्षेत्र में भौतिकवाद
और आचार-मीमांसा में सुखवाद की स्थापना करता है।
आलोचना
चार्वाक द्वारा अनुमान के खण्डन के विरुद्ध मुख्य
तर्क निम्नलिखित है -
1.
यदि चार्वाक से यह प्रश्न पूछा जाए की
केवल प्रत्यक्ष को ही क्यों प्रमाण माना जाए तो वे या तो मौन रहेंगे या उत्तर देगें
कि अभ्रान्त एवं निश्चयात्मक होने के कारण
वह सर्वथा मान्य है। यदि वे मौन रहते है तो स्पष्टतः उनके पास अपने मत के लिए कोई
प्रमाण नहीं है। यदि वे दूसरे विकल्पों को स्वीकार करते है तो फिर वे स्वयं अनुमान
की सहायता लेते हैं। क्योंकि कुछ प्रत्यक्षों के निश्चित और असंदिग्ध होने के कारण
वे सभी प्रत्यक्षों के भी निश्चित एवं असंदिग्ध होने का अनुमान कर लेते है।
2.
प्रत्यक्ष प्रमाण के समर्थन में दी गई
उनकी यह युक्ति की "यह(प्रत्यक्षज्ञान) निर्विवाद और दोषरहित होता है, अनुमान एवं शब्द पर भी लागू होती है। इसलिए
अनुमान और शब्द भी स्वीकार योग्य है। यदि चार्वाक यहाँ यह कहें कि अनुमान और शब्द कभी-कभी
दोषयुक्त होते हैं तो यह आक्षेप प्रत्यक्ष पर भी लगाया जा सकता है क्योंकि कभी-कभी
प्रत्यक्ष भो दोषयुक्त और भ्रमात्मक होता है, यथा-रज्जू में सर्प का प्रत्यक्ष,
सीपी में चांदी का प्रत्यक्ष।
3.
व्यावहारिक जीवन की सफलता के लिए
अनुमान को ज्ञान के यथार्थ साधन के रुप में स्वीकार करना आवश्यक है। दैनिक जीवन
में तर्क-वितर्क, साध्य प्राप्ति हेतु साधनों का चयन, वैज्ञानिक अनुसंधान आदि के लिए अनुमान आवश्यक है।
4.
चार्वाक ने अनुमान का खण्डन जिन-जिन तर्कों
से किया है ये तर्क कालान्तर में अनुमान की ही पुष्टि करते है। अनुमान का तत्व तर्क
है। तर्क और अनुमान मानसिक क्रियाएं हैं। अत:
दोनो अभौतिक है। चार्वाक अभौतिक सत्ताओं को स्वीकार नहीं करता। परन्तु उसे अपने निष्कर्ष
पर पहुँचने के लिए अभौतिक प्रक्रियाओं का सहारा लेना पड़ता है। सिद्धान्त या विचार
अभौतिक हैं। इसलिए उन्हें अनुमित ही किया जा सकता है। स्पष्ट है कि अनुमान के अभाव
में चार्वाक अपने विचार तक नहीं पहुँच सकता
मूल्यांकन
चार्वाक के प्रत्यक्षवादी ज्ञानमीमांसा में गंभीर
विसंगतियां विद्यमान है। वे अनुमान, शब्द
और उपमान के खंडन में तर्कतः सफल नहीं हो पाए हैं। फिर भी इनके ज्ञानमीमासीय विचारों
की अपनी महत्ता है। इनके ज्ञानमीमासीय विचारों ने भारतीय विचारकों के समक्ष अनेक
समस्या पैदा की जिनका समाधान करने के लिए ये विवश हए। फलस्वरूप भारतीय दर्शन पुष्ट, समृद्ध और विकसित हुआ। पुनः चार्वाक विचारकों
में भारतीय दर्शन को रूढ़िवादी और अंधविश्वासी होने से बचाया।
चार्वाक की तत्वमीमांसा (Metaphysics) की विवेचना
अतीन्द्रिय
सत्ताओं का खण्डन (Rejection of Transcendent Entities)
चार्वाक की भौतिकतावादी तत्वमीमांसा उनके
प्रत्यक्षवादी ज्ञानमीमांसा पर आधारित है। चूंकि चार्वाक प्रत्यक्ष को एकमात्र
प्रमाण के रूप में स्वीकार करते है इसलिए विश्व के मूल में उन्हीं तत्वों को स्वीकार
करते है जिनका प्रत्यक्षा ज्ञान होता है। प्रत्यक्ष द्वारा केवल जड द्रव्यों का
ज्ञान हो सकता है। इसी कारण चार्वाक ईश्वर, आत्मा स्वर्ग, नरक,
पूर्वजन्म, पुनर्जन्म,
आध्यात्मिक लक्ष्य, मोक्ष, अदृष्ट आदि अतीन्द्रिय विषयों का खण्डन
करते हैं। जीवन और जगत् के मूल तत्व के रूप में जड़ तत्व
की सत्ता को स्वीकार करने के कारण चार्वाक जड़वाद या भौतिकवाद (Materialism) का प्रतिपादन करते हैं। चूंकि जड़ तत्व
चार प्रकार के हैं पृथ्वी, जल, वायु, तेज।
इसलिए इनका तत्वमीमांसीय सिदान्त बहुतत्ववादी जड़वाद कहलाता है।
तत्वमीमांसा में मुख्यतः तीन विषयों की विवेचना
की जाती है। (1) जगत, (2) आत्मा और (3) ईश्वर। चार्वाक तत्वमीमांसा में इनका
विशिष्ट रूप से विवेचन किया गया है।
जगत विचार
अधिकांश भारतीय विचारकों के मतानुसार जगत के
मूल में पाँच (5) तत्व हैं।
(1) आकाश
(2) वायु
(3) अग्नि पञ्च महाभूत
(4) जल
(5) पृथ्वी
किंतु चार्वाक आकाश के अस्तित्व को नहीं मानते
क्योंकि इसका प्रत्यक्ष नहीं है। अतः उनके अनुसार जगत शेष चार प्रकार के भूतों
(तत्वों) से ही निर्मित हैं। इन चार तत्वों के विविध अनुपातों में सम्मिश्रण होने
से बाह्य जगत, भौतिक शरीर, इन्द्रियां आदि उत्पन्न होती है !
चार्वाक के अनुसार जिस प्रकार आग का स्वभाव गर्म होना, जल का स्वभाव ठंडा होना, उसी प्रकार उपरोक्त चार भूतों का स्वभाव विश्व का निर्माण करना है। चार्वाक के इस मत को स्वभाववाद (Naturalism) कहा जाता है। चार्वाक के अनुसार यह विश्व प्रयोजनविहीन है। सृष्टि की रचना के पीछे कोई प्रयोजन या उद्देश्य नहीं है। यह मशीन की भांति है। यही कारण है कि चार्वाक मत को यंत्रवाद (Mechanism) कहा जाता है। पुनः चार्वाक विश्व की व्याख्या वस्तुवादी दृष्टिकोण (Realistic point of view) से करता है।
अतीन्द्रिय सत्ताओं का निराकरण (Rejection of Transcendent Entities)
आत्मा-विचार:-
आत्मा
की अमरता का खण्डन
चार्वाक और बौद्ध दर्शन को छोड़कर अन्य भारतीय
दर्शनों में चेतना को नित्य आत्मा का स्वरूप या आगन्तुक गुण या अनिवार्य गुण माना गया है। परन्तु
चार्वाक मतानुसार चेतना शरीर का गुण है क्योंकि चैतन्य की उत्पत्ति भूतों (Matters) के विशिष्ट सम्मिश्रण से जीवित शरीर में होती
है। प्रत्यक्ष से हमें अपरिवर्तनशील, अमर, अभौतिक तत्व "आत्मा” का ज्ञान नहीं
होता है। अतः जीवित शरीर से भिन्न कोई आत्मा नहीं है। इनके अनुसार चेतना से
विशिष्ट शरीर को ही आत्मा कहना चाहिए -"चैतन्यविशिष्ट देह: एव आत्मा"। चार्वाक के आत्मा संबंधी इस
मत को देहात्मवाद कहा जाता है। आत्मा शरीर से अभिन्न है।
शरीर और आत्मा के तादात्म्य के पक्ष में
चार्वाक दो मुख्य तर्क देते है
1.
अन्वय और व्यतिरेक दोनों से यह सिद्ध
है कि शरीर से भिन्न कोई आत्मा नहीं है। जब तक शरीर रहता है तब तक आत्मा भी रहती है।
जब शरीर का विनाश होता है तो आत्मा भी नष्ट हो जाती है।
2.
दैनिक अनुभवों से भी आत्मा और शरीर के
तादात्म्यता (Identity) क ज्ञान होता है
जैसे- कोई व्यक्ति कहता है कि मैं ‘मोटा हूँ, मैं
सुखी हूँ’ आदि, तब यह कथन आत्मा और शरीर की एकता को सिद्ध करते हैं।
3.
यदि आत्मा शरीर से भिन्न होती है, तो
फिर मृत्यु के उपरान्त शरीर से पृथक उसका रूप प्रत्यक्षित होता. परन्तु हमें ऐसा
प्रत्यक्ष कभी नहीं होता।
4. वैद्यक शास्त्र भी यह मानता है कि चैतन्य का भौतिक शरीर के साथ संबंध है। शरीर के स्वास्थ्य का प्रभाव हमारी चेतना पर पड़ता है। पौष्टिक भोजन से मस्तिष्क सुदृढ़ होता है जबकि कुपोषण से चेतना शिथिल हो जाती है।
यहाँ एक आक्षेप किया जाता है कि जब किसी भी जड़
तत्व में चैतन्य नहीं पाया जाता तो फिर उनके योग से बने हुए शरीर में इसका
प्रादुर्भाव कैसे हो सकता है ? चार्वाक इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि जिस
प्रकार मदिरा के विभिन्न घटकों में से किसी में भी मादकता नहीं है किंतु जब उनमें विशेष
प्रक्रिया से विकार उत्पन्न किया जाता है तो मदिरा में मादकता उत्पन्न हो जाती है।
पुनः जिस प्रकार पान, कत्था, चूना, सुपारी में से
किसी में भी लालिमा नहीं होती किन्तु जब उन्हें मिलाकर खाया जाता है तो लाली उत्पन्न
हो जाती है। इस प्रकार यद्यपि जड तत्वों में चैतन्य नही है फिर भी जब इन जड़तत्वों
का सम्मिश्रण होता है तो शरीर की उत्पत्ति होती है और उसमें एक नए गुण चैतन्य का
आविर्भाव हो जाता है।
ईश्वर-विचार
का खण्डन
चार्वाक ईश्वर की सत्ता का खंडन करते हैं
क्योंकि यह प्रत्यक्ष से प्रमाणित नहीं है। चार्वाक अनुमान
या शब्द के आधार पर भी ईश्वर के अस्तित्व सिद्धि के प्रयासों का खण्डन करते हैं
क्योंकि अनुमान और शब्द प्रमाण नहीं हैं।
सामान्यतः संसार के निमित्त कारण के रूप में
ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार किया जाता है। इसके विपरीत चार्वाक का कहना है कि
जड़ तत्व अपने-अपने स्वभाव के अनुसार ही संयुक्त होते हैं, और उनके स्वतः
सम्मिश्रण से संसार की उत्पत्ति होती है। इसलिए चार्वाक मत स्वभाववाद
कहलाता है। पुनः चार्वाक मत के अनुसार संसार की उत्पत्तिः किसी प्रयोजन साधन के
लिए नहीं हुई है। संसार तो जड़ तत्वों के आकस्मिक संयोग का परिणाम है। इसलिए
चार्वाक मत को यदृच्छावाद (Accidentalism) भी कहा जाता है।
चार्वाक का भौतिकवाट नैतिक क्षेत्र में सुखवाद
की ओर ले जाता है। जब ईश्वर, आत्मा, परलोक, पुनर्जन्म, कर्म सिद्धान्त सभी
काल्पनिक हैं तब फिर यह संसार और वर्तमान जीवन ही व्यक्ति के लिए शेष बचता है।
धर्म और मोक्ष चार्वाक को मान्य नहीं है। काम ही एकमात्र पुरुषार्थ है और अर्थ काम
प्राप्ति का साधन मात्र । अतः व्यक्ति को अर्थ और काम के लिए ही प्रयत्न करना
चाहिए।
स्वर्ग-नरक की अवधारणा का खण्डन
स्वर्ग-नरक वह पारलौकिक स्थान है जहाँ आत्मा
अपने किये गये कर्म का फल प्राप्त करती है। चार्वाक मतानुसार यदि स्वर्ग-नरक
वास्तविक सत्ताएँ हैं तो फिर उनका प्रत्यक्ष होना चाहिए। परन्तु ऐसा नहीं होता।
अतः इनकी सत्ता में विश्वास करने का आधार नहीं है।
स्वर्ग और नरक की अवधारणा नित्यात्मा, पुनर्जन्म
एवं कर्मफल में विश्वास पर आधारित है चार्वाक इनका खण्डन करता है। परिणामस्वरूप वह
स्वर्ग-नरक के भी अस्तित्व को नकारता है।
आलोचना
1.
ईश्वरवादियों का मानना है कि जडतत्व
सृष्टि का उपादान कारण तो हो सकता है परंतु सृष्टि के उदभव के लिए। इतना ही
पर्याप्त नहीं है। इसके लिए निमित्त कारण का होना जावश्यक है।
2.
(यदि)चेतना जीवित शरीर का गुण है तो
उसे शरीर से अवियोज्य रहना चाहिए तथा उसे जीवन पर्यन्त उसके साथ सम्बद्ध होना
चाहिए। लेकिन मूर्छा, बेहोशी आदि में जीवित
शरीर में चैतन्य की अभिव्यक्ति नहीं होती।
3.
जड़-तत्व और चैतन्य एक दूसरे से
स्वभावतः और स्पष्टतः भिन्न है। ऐसे जड़ तत्व से चैतन्य की उत्पत्ति का अर्थ है
असत् से सत् की उत्पत्ति किंतु असत् से सत् की उत्पत्ति नहीं हो सकती।
4.
चार्वाक आत्मा और ईश्वर की सत्ता का
खंडन करने में तर्कतः सफल नहीं हो पाये हैं। यहां इनके खण्डन में चार्वाक प्रत्यक्ष
की सीमा का अतिक्रमण करते हैं। वे आत्मा और ईश्वर का प्रत्यक्ष ना होने के कारण
उनके अभाव का अनुमान कर लेते हैं। जो चार्वाक के ज्ञानमीमांसीय दृष्टिकोण के
विपरीत है।
निष्कर्ष
उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि चार्वाक अपने प्रमाण विचार के अनुरूप तत्व विचार की व्याख्या करने में तार्किक रूप से सफल प्रतीत नहीं होते है। फिर भी भारतीय दर्शन में इनकी महत्ता को अस्वीकार नही किया जा सकता। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इन्होंने भारतीय दर्शन को रुढिवादी एवं अंधविश्वासी होने से बचाया।
नीति-विचार
या आचार मीमांसा (Ethics)
चार्वाक का नीति विचार उनके ज्ञानमीमांसीय एवं तत्वमीमांसीय
विचारों से प्रभावित एवं संचालित है। चार्वाक
नैतिकता के क्षेत्र मे हालांकि इहलौकिकवाद, स्वार्थवाद, सुखवाद को
प्रश्रय देते हैं। इनके अनुसार नैतिक दृष्टि से वही कर्म उचित है जिससे इस जीवन
में शारीरिक सुखों की प्राप्ति हो सके। वे भारतीय दर्शन में स्वीकार्य चार पुरुषार्थों
में से केवल अर्थ और काम को स्वीकार करते
हैं। उनके अनुसार इनमें काम परम पुरुषार्थ है एवं अर्थ उसकी प्राप्ति का साधन है। चार्वाक
के नीति विचार का प्रतिपादन नीचे दिये गये श्लोक से स्पष्ट होता है
यावज्जीवेतू सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा धृतं पिबेत्।
भस्मीभूत्तस्य देहस्य पुनरागमनम् कुतः। ।।
अर्थात् जब तक जीओ,
सुख से जीओ, ऋण लेकर भी घी पीओ। शरीर के विनाश के पश्चात् यहाँ पुनः आगमन नहीं है।
आत्मा, स्वर्ग, कर्म नियम, पुनर्जन्म आदि की
सत्ता को न मानने के कारण वे इस जीवन के अपने इन्द्रिय सुखों की प्राप्ति को ही
जीवन का लक्ष्य निर्धारित करते है (इहलौकिक निकृष्ट स्वार्थवादी,सुखवादी)।
चार्वाक की नीति-विचार की तुलना पाश्चात्य के अरिस्टिप्पस
के स्वार्थमूलक सुखवाद से की जा सकती है।
बाद के कुछ सशिक्षित चार्वाकों ने काम और अर्थ
के अतिरिक्त नैतिक मूल्य के रूप में धर्म को भी स्वीकार किया है।
चार्वाक
दर्शन : नीति विज्ञान
नीति
विज्ञान भारतीय दर्शन का प्रमुख विषय है। इसका उद्देश्य जीवन के चरम लक्ष्य की
व्याख्या करना है।
भारत
के दार्शनिकों ने मानव जीवन के चार लक्ष्य(पुरुषार्थ) बताए हैं। यथा -
(1)
धर्म (2) अर्थ (3) काम (4) मोक्ष।
इनको
मानव जीवन के चार पुरुषार्थ या 'पुरुषार्थ चतुष्टय' कहा जाता है। चार्वाक दर्शन इन
चारों में से केवल अर्थ और काम को ही जरूरी मानता है।
इस
सम्बन्ध में चार्वाक दर्शन कहता है—"धर्म को मनुष्य के कर्मों का लक्ष्य नहीं
कहा जा सकता। धर्म-अधर्म का ज्ञान पुराण शास्त्रों से मिलता है। वेद में भी
धर्म-अधर्म के बारे में कहा गया है । वेदानुकूल कर्म को ही धर्म तथा वेद विरोधी
कर्म को अधर्म माना गया है।"
चार्वाक
दर्शन वेद को प्रमाणित या सत्य नहीं मानता। वह वेद में वर्णित धर्म के विचार को भी
भ्रांतिमूलक मानता हुआ कहता है--''ब्राह्मणों ने
वेदों को रचा है। उन्होंने अपने जीवन-निर्वाह के लिए धर्म-अधर्म और पाप-पुण्य की
बातें कहकर लोगों को ठगना चाहा है। नरक से बचने के लिए और स्वर्ग को पाने के लिए
वैदिक कर्म करना निरर्थक ही है। श्राद्ध में प्रेतात्माओं को तृप्त करने के लिए
भोजन अर्पित किया जाता है। प्रेतात्माओं जैसे लोगों का कोई अस्तित्व नहीं है इसलिए
उनको भोजन अपर्ण करना मूर्खता है। यदि श्राद्ध में अर्पित किया गया भोजन स्वर्ग
में बैठी प्रेतात्माओं की भूख मिटाता है तो निचले कमरों से अर्पित किया गया भोजन
ऊपरी कमरों के लोगों को तृप्त क्यों नहीं करता है ?"
चार्वाक
दर्शन आगे कहता है-"अगर एक व्यक्ति के खाने से दूसरे आदमी को भोजन मिल जाए तो
पथिक को अपने साथ खाद्य पदार्थ या भोजन लेकर नहीं चलना चाहिए। वह तो अपने
सम्बन्धियों को अपना नाम लेकर घर पर भोजन करने का आदेश दे सकता है। जब एक जगह के
लोगों द्वारा अर्पित किया भोजन दूसरे स्थान के लोगों की भूख नहीं मिटा पाता तो इस
लोक में अर्पित भोजन परलोक में कैसे जा सकता है ? मृतक व्यक्ति को भोजन खिलाना
मृतक घोड़े को घास खिलाने के बराबर है।"
वैदिक
कर्मकाण्ड पशुबलि प्रथा का समर्थक है। चार्वाक दर्शन में पशु बलि देने बालों
ब्राह्मणों को 'भाण्ड धूर्त निशाचर' कहा है। वह बताता है—"ब्राह्मणों का तर्क
है कि बलि का पशु स्वर्ग जाता है। यदि यह
सच है तो अपने बड़े माँ बाप की बलि वे लोग क्यों नहीं अपने माँ बाप के लिए स्वर्ग
में स्थान निश्चित कर लेते हैं।... पुरोहितों ने अपने व्यावसायिक लाभ के लिए इस
प्रकार की धार्मिक रीतियों का निर्माण किया। बलि के नाम पर निर्दोष जीवों की हिंसा
करना महान (सबसे बड़ा) अत्याचार है।" धर्म के साथ-साथ चार्वाक दर्शन में
धार्मिक रीति-रिवाज का भी खण्डन किया है। साथ ही सभी तरह के नैतिक नियमों का खण्डन
किया है।
चार्वाक
दर्शन कर्म सिद्धान्त का भी खण्डन करता है। कर्म सिद्धान्त के मुताबिक अच्छा कर्म
करने से सुख तथा बुरे कर्म करने से इंसान को सुख मिलता है। चार्वाक दर्शन इस
सिद्धान्त को नहीं मानता क्योंकि उसका विश्वास है कि कर्म सिद्धान्त का ज्ञान
प्रत्यक्ष से नहीं हो पाता है।
चार्वाक
दर्शन 'मोक्ष' को नहीं मानता। मोक्ष का मतलब है-दु:खों का विनाश या। दु:खों से
मुक्ति पा लेना। भारतीय दर्शन में कहा गया है कि मनुष्य की आत्मा ही मोक्ष को पाती
है। चार्वाक दर्शन में कहा गया है "जब आत्मा का अस्तित्व नहीं है तो मोक्ष की
प्राप्ति भला किसे होगी?"
भारतीय
दर्शन के अनुसार मोक्ष की प्राप्ति मृत्यु के उपरान्त होती है। कुछ दार्शनिकों का
कहना है कि मनुष्य को अपने जीते जी मोक्ष मिल जाता है। चार्वाक कहता है- "जीवन
काल में मनुष्य के सारे दु:खों का अन्त नहीं हो सकता। जब तक मनुष्य के पास शरीर है
तब तक उसे सांसारिक या शारीरिक दुःख-कष्ट भुगतने ही पड़ते हैं। वैसे दुःखों को आदमी
कम कर सकता है लेकिन उसके सारे दुःख तो उसकी मृत्यु के बाद ही दूर होते हैं। ...
इस कारण मोक्ष मनुष्य का पुरुषार्थ नहीं कहा जा सकता।"
चार्वाक
दर्शन धर्म और मोक्ष का खण्डन करता हुआ अर्थ और काम को जीवन या लक्ष्य स्वीकार
करता है। यह दर्शन कहता है-"मानव जीवन में अर्थ या धन महत्त्वपूर्ण स्थान
रखता है। धन कमाने के लिए इंसान हमेशा कोशिश में लगा रहता है। इसके लिए वह कई प्रकार के कार्य करता है। लेकिन अर्थ या धन भी जीवन का चरम
लक्ष्य नहीं है। अर्थ की उपयोगिता सुख या काम की प्राप्ति में मदद करना है। धनरूपी
साधन से सुखों की प्राप्ति होती है लेकिन धन का अपने आप में मूल्य नहीं है। केवल
सुख के साधन के कारण ही उसका मूल्य है। काम(सुख) ही मानव जीवन का चरम पुरुषार्थ
है।"
इस
तरह काम की प्राप्ति को ही चार्वाक दर्शन मानव जीवन का एक मात्र उद्देश्य मानता
हुआ कहता है-"कामैवैक: पुरुषार्थ:"
काम
का मतलब है— इच्छाओं का तृप्त होना । मनुष्य संसार में सारे काम अपने सुख इच्छा की
पूर्ति के लिए करता है। हर काम के पीछे मनुष्य की सुख पाने की भावना रहती है। सुख की
'कामना' करना इंसान का स्वभाव होता है।
चार्वाक
दर्शन सुख को (सुख की 'कामना' या 'काम' को) जीवन का अन्तिम लक्ष्य मानता है। इसलिए
इस दर्शन को सुखवादी दर्शन' कहा गया है। चार्वाक दर्शन अपने नीति-विज्ञान में इसी सुखवाद के सिद्धान्त को
स्वीकार करता है।
चार्वाक
कहता है- "इंसान को वही काम करना चाहिए, जिससे उसे सुख की प्राप्ति हो सके।
शुभ (अच्छा और सुन्दर) जीवन वही होता है, जिसमें ज्यादा से ज्यादा सुख और कम से कम
दुःख होता है। जबकि अशुभ जीवन में सुख थोड़ा और दुःख बहुत ज्यादा होता है।...
अच्छा काम वह कहलाता है जिसे आदमी को ज्यादा से ज्यादा सुख पाप्त हो सके जबकि बुरा
काम वह होता है जिससे आदमी ज्यादा से ज्यादा दु:ख पाए। हरेक आदमी को यह अधिकार है
कि वह ज्यादा से ज्यादा सुख पाने की इच्छा या कामना अपने मन से करे। इन्द्रिय सुख,
बौद्धिक सुख से कई गुना ज्यादा श्रेष्ठ होता है।"
भारत
में कई दार्शनिकों और विचारकों ने सांसारिक सुखों के त्याग को ज्यादा महत्त्व दिया
है। इन महापुरुषों का कहना है "अगर कोई आदमी सुख पाने की इच्छा मन में करता
है तो सुख प्राप्ति के लिए कुछ न कुछ दु:ख उठाना ही पड़ता है। मनुष्य को इसी वजह
से सुख पाने की कामना नहीं करनी चाहिए। उसे अपनी पाशविक प्रवृत्तियों का दमन करना
चाहिए।"
चार्वाक
दर्शन इस प्रकार के तर्क से अहसमति प्रकट करते हुए बताता है—"दु:ख के डर से
सुख का त्याग करना मनुष्य की महान मूर्खता ही कही जाएगी। यद्यपि अन्न भूसे से
मिश्रित होता है लेकिन भूसे के डर से कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति अन्न खाना नहीं छोड़
देता। मछली के अन्दर कांटा होता है लेकिन लोग कांटे के डर से मछली खाना नहीं छोड़ते
हैं। इसी प्रकार से भले ही गुलाब के पौधे में कांटे होते हैं लेकिन लोग कांटे के
डर से सुन्दर गुलाब के फूल तोड़ना नहीं छोड़ते हैं। भिखारियों की आदत होती है भोजन
मांगने की, लेकिन उनके डर से कोई भी आदमी भोजन
पकाना या बनाना नहीं छोड़ता है। किसान जानता है कि कोई जानवर उसके खेत में घुसकर
उसकी फसल बर्बाद कर सकता है लेकिन इस डर से कोई भी आदमी (किसान) अपने खेत में बीज
बोना नहीं छोड़ता। यद्यपि सब जानते हैं कि चन्द्रमा में काला दाग है लेकिन इस डर
से बुद्धिमान लोग चन्द्रमा की शीतल चाँदनी का आनन्द पाना नहीं छोड़ते हैं। हवा धूल
से संयुक्त होती है लेकिन गर्मी के मौसम में इस डर से भला कौन आनन्दमयी समीर या
हवा से लाभ नहीं लेना चाहता। सुख भी हमेशा द:ख से व्याप्त रहता है । इंसान का फर्ज
है कि वह जीवन के सुख को दुःख से अलग समझकर उसका उपयोग करे लेकिन जो आदमी दुःख से
डरकर सुख को छोड़ देता है, वह बेवकूफ नहीं तो और क्या है ?
चार्वाक
मत के मुताबिक "मनुष्य को चाहिए कि वह अपने वर्तमान जीवन में सुख को अपनाने
का ध्येय या लक्ष्य रखे। पारलौकिक तथा आध्यात्मिक सुख को अपनाने के लक्ष्य से अपने
वर्तमान जीवन के सुख का त्याग करना एक प्रकार का पागलपन ही है। हमारा अस्तित्व
अपने शरीर और वर्तमान जीवन तक ही सीमित है। इस कारण से इंसान को अपने वर्तमान जीवन
में ही ज्यादा से ज्यादा सुख पाने का प्रयत्न करना चाहिए।
वर्तमान
सुख ही सबसे बड़ा है। भूतकाल तो बीत चुका है। भविष्य संदिग्ध है। केवल वर्तमान ही हमारा निश्चित है। हमारा अधिकार केवल अपने
वर्तमान जीवन पर है। कल तो आने वाला है,
वह अनिश्चित है। कल मुझको मोर मिलेगा, इस आशा के साथ कोई भी शिकारी अपने हाथ में
आए कबूतर को कभी नहीं छोड़ता। अनिश्चित स्वर्ण मुद्रा से निश्चित कौड़ी मूल्यवान
होती है। अपने हाथ में आए धन को दूसरे के लिए छोड़ देना मूर्खता ही कही जाएगी।
निश्चित सुख को छोड़ अनिश्चित सुख की कामना करना अदूर-दर्शिता है। ... जो कुछ भी
सुख मिले, उसे वर्तमान में भोग लेना चाहिए। खाओ. पियो और मौज उड़ाओ'-क्योंकि कल
मृत्यु भी हो सकती है।"
"यावज्जीवेत
सुखं जीवेत्।
ऋणं
कृत्वा घृतं पिवेत्।।"
अर्थात्
जब तक जिएँ सुख से जिएँ। सुख पाने के लिए अगर ऋण भी लेना पड़े तो इस काम में पीछे
नहीं हटना चाहिए।
चार्वाक
के अनुसार "जिस तरह हो सके, सुख-साधन, धन इकट्ठा करना चाहिए। अपनी इन्द्रियों
को तृप्त करना चाहिए। वासनाओं और तृष्णाओं को दबाना नहीं चाहिए। क्योंकि ऐसा करना
अस्वाभाविक तथा अप्राकृतिक होता है। शारीर से प्राप्त सुख ही सबसे बड़ा सुख है।
कामिनी के आलगिंन से पाया सुख ही परम सुख होता है।"
चार्वाक
दर्शन मदिरा, कामिनी और शारीरिक सुख को प्रमुखता देता है। इस दर्शन का यह सुखवाद
यूरोप के स्वार्थमूलक सुखवाद (प्रवर्तक-अरिस्टिपस) जैसा है। चार्वाक भी स्वार्थ
सुखानुभति को जीवन का चरम लक्ष्य मानता है। यूरोपीय स्वार्थमूलक सुखवाद के अनुसार
"मनुष्य को वही कर्म करना चाहिए जिससे कि निजी सुख प्राप्त हो।"
चार्वाक
भी निजी सुख अपनाने के लिए कहता है। चार्वाक सुखों में गुणात्मक भेद नहीं मानता।
वह किसी सुख को उच्च कोटि तथा किसी सुख को निम्न कोटि का नहीं कहता है।
चार्वाक
इस संसार के अलावा अन्य किसी संसार (परलोक,स्वर्ग आदि) को नहीं मानता। वह मानता है
कि इस जीवन के बाद और कोई दूसरा जीवन नहीं है, इसलिए। हमको इसी जीवन में ज्यादा से
ज्यादा सुख पाने का प्रयत्न करना चाहिए। चार्वाक का यह सुखवाद 'निकृष्ट
स्वार्थमूलक सुखवाद' कहलाता है।
चार्वाक
एक ऐसे समाज का निर्माण करता है जिसमें ईश्वर, स्वर्ग, नरक और धर्म का नामो निशान
नहीं है। इस समाज में आदमी केवल अपने निजी सुख के लिए ही प्रयत्न करता रहता है।
चार्वाक
दर्शन : समीक्षा
चार्वाक
दर्शन भारतीय दर्शन की विचारधारा के साधारण लक्षणों का खण्डन करता है। इसलिए भारत
के हर दार्शनिक ने इस दर्शन की आलोचना की है। चार्वाक दर्शन का मुख्य आधार प्रमाण
विज्ञान (प्रत्यक्ष प्रमाण) है। चार्वाक प्रत्यक्ष को ही एक मात्र प्रमाण मानता
है। अनुमान को वह अप्रामाणिक मानता है। इसके विरुद्ध भारतीय दार्शनिकों ने कई
आपत्तियाँ दर्शायी हैं। यथा
"यदि
अनुमान को इस अप्रामाणिक मानें तो हमारा जीवन कठिन हो जाएगा। जिन्दगी के हर
क्षेत्र में हमको अनुमान का सहारा लेना पड़ता है। जब हम पानी पीते हैं तो इसी अनुमान
से कि इससे हमारी प्यास बुझेगी। हम इसी अनुमान से फिल्म देखने जाते कि उससे हमें
सुख मिलेगा। बादलों को देखकर किसान अनुमान लगाता है कि बरसात होगी। बाजार में हम
किसी दुकान पर इसी अनुमान के साथ जाते हैं कि वहाँ हमारी इच्छा की चीज मिलेगी।
दूसरे लोगों की बातों या कथनों का हम अनुमान के आधार पर ही निष्कर्ष निकालते हैं
और अपने विचार दूसरों तक पहुँचाने की कोशिश करते हैं।"
भारतीय
दार्शनिकों के अनुसार "चार्वाक खुद अनुमान का प्रयोग करता है। जब चार्वाक
कहता है कि प्रत्यक्ष ही ज्ञान का एक मात्र साधन है और अनुमान व शब्द अप्रमाणिक है
तो उसके ये विचार भी अनुमान के फल है। बिना अनुमान के कोई भी निष्कर्ष नहीं निकाला
जा सकता।"
चार्वाक
शब्द को भी अप्रमाणिक मानता है। लेकिन मानव के ज्ञान का अधिकांश भाग शब्दों पर
टिका है। इन शब्दों को पढ़कर तथा सुनकर ही कई चीजों का ज्ञान पाते हैं। यदि हम
शब्द को ज्ञान का साधन नहीं मानेंगे तो हमारा ज्ञान क्षेत्र सीमित या संकुचित हो जाएगा।
चार्वाक
वेद को अप्रमाणिक मान वैदिक शब्द का खण्डन करता है। लेकिन चार्वाक ने कहा है कि
वेद धूर्त ब्राह्मणों ने रचे हैं लेकिन ऐसा कहना गलत है। वेद तो उन महर्षियों ने
रचे हैं जो कि त्यागी और तपस्वी थे। जिनके दिल में स्वार्थ-पक्षपात नहीं था। उनके
अन्दर जीविकोपार्जन और सांसारिक सुखभोग की अभिलाषा न थी।
चार्वाक
प्रत्यक्ष को ज्ञान का एक मात्र साधन मानता है। लेकिन चार्वाक का यह मानना कि
प्रत्यक्ष निश्चित और संदेह रहित होता है, गलत है। कई बार प्रत्यक्ष देखने से भी
निष्कर्ष सही नहीं निकलते। हमें प्रत्यक्ष रूप से सूर्य, पृथ्वी के चारों ओर घूमता
दिखाई देता है लेकिन असलियत यही है कि पृथ्वी, सूर्य के चारों ओर घूमती है।
प्रत्यक्ष देखने में सूरज छोटा सा लगता है लेकिन सत्य यह है कि पृथ्वी से कई गुने
बड़े आकार वाला है। जब हम रेल यात्रा करते हैं तो ट्रेन में बैठे बैठे हमको ऐसा
लगता है कि वृक्ष, पहाड़, नदी आदि पीछे की ओर भाग रहे हैं लेकिन यह प्रत्यक्ष
ज्ञान सत्य नहीं है। पृथ्वी प्रत्यक्ष रूप से चपटी दिखाई देती है लेकिन यह बिल्कुल
गोल है। कई बार अन्धेरे में आदमी रस्सी को
साँप समझकर डर जाता है लेकिन यह प्रत्यक्ष अनुमान भ्रमपूर्ण होता है। तात्पर्य यह
है कि प्रत्यक्ष ज्ञान मनुष्य को यथार्थ ज्ञान नहीं दे पाता है। चार्वाक दर्शन के मुताबिक
यदि प्रत्यक्ष ज्ञान को ही ज्ञान का एक मात्र साधन माना जाए तो मनुष्य का ज्ञान
क्षेत्र सीमित हो जाएगा। कई चीजों का ज्ञान प्रत्यक्ष दर्शन से नहीं हो पाता।
खासकर एक रंग के रासायनिक पदार्थ आदि का इसलिए चार्वाक के प्रत्यक्ष प्रमाण को
स्वीकार नहीं किया जा सकता।
चार्वाक
दर्शन का प्रमाण विज्ञान ही नहीं बल्कि तत्व विज्ञान भी सदोष है। चार्वाक मानता है
कि विश्व का निर्माण पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु आदि चार तत्त्वों के मिलने से अपने
आप हो जाता है लेकिन प्रश्न उठता है कि चारों भूत गतिहीन या जड़ होने की वजह से
आपस में किस प्रकार मिलेंगे? अगर भूतों में गति का अभाव है तो गतिहीन तत्वों या
भूतों से संसार का निर्माण कैसे हो सकता है। चार्वाक दर्शन में भूत या जड़ तत्वों
के जरिए सारे विश्व की व्याख्या की गयी है लेकिन भूत से सारे विश्व की व्याख्या
नहीं की जा सकती।
विश्व
में दो तरह की चीजें हैं-
(अ)
भौतिक चीजें (ब) अभौतिक चीजें।
चार्वाक
भूत या तत्व के जरिए भौतिक वस्तुओं की व्याख्या तो कर सकता है। लेकिन जीव और चेतना
आदि अभौतिक चीजों की व्याख्या वह नहीं कर पाता। चार्वाक मानता है कि चेतना का
विकास भूत से हुआ है लेकिन जड़ या अचेतन से भला चेतन का विकास कैसे हो सकता है?
आज
तक किसी आदमी ने भूत या जड़ तत्त्व से चेतन की उत्पत्ति होते नहीं देखी। चार्वाक
पान, कत्था, चूना, कसैली का उदाहरण देता है लेकिन यह तर्क न होकर उपमा ही है। उपमा
पर आधारित चैतन्य की व्याख्या अमान्य ही है। इस प्रकार से चार्वाक के विश्व
सम्बन्धी विचार एकांगी ही है।
चार्वाक
दर्शन आत्मा और ईश्वर जैसी अप्रत्यक्ष शक्तियों या सत्ताओं पर विश्वास नहीं करता।
वह संसार को भी मशीनी अथवा यंत्रवत् ही मानता है। यह दर्शन कहता है-"कोई दूसरी
शक्ति संसार को नहीं चलाती। विश्व के प्रयोजन या व्यवस्था का अभाव दिखाई देता
है।"
लेकिन
संसार की ओर दृष्टिपात करने पर चार्वाक दर्शन हमको कहीं भी सन्तोषजनक प्रतीत नहीं
होता है। दुनिया या संसार को देखने पर एक प्रकार की व्यवस्था और प्रयोजन। का पता
चलता है। रात और दिन एक व्यवस्था के अन्दर आते रहते हैं। एक ऋतु के बाद दूसरी ऋतु
का आना, सूरज का प्रतिदिन उदय और अस्त होना यह सब संसार के प्रयोजनमय होने को
दर्शाता है।
चार्वाक
का यह कथन सत्य और संगत नहीं है कि संसार एक यंत्र अथवा मशीन की तरह प्रयोजनहीन और
स्वत:चालित है।
चार्वाक
दर्शन में आत्मा को शरीर की तरह माना गया है। इसके बार दार्शनिकों ने विरोधी मत
प्रकट किए हैं, जो कि इस प्रकार हैं-
1.
चार्वाक के अनुसार चेतना आत्मा का नहीं
बल्कि शरीर का गुण है। लेकिन
चेतना को शरीर का गुण तभी
माना जाएगा, जब शरीर में चेतना हमेशा रहती हो। बेहोशी और स्वप्नहीन निद्रा का
अवस्था में शरीर तो मौजूद रहता है लेकिन चेतना नहीं रहती। इससे पता चलता है कि
चेतना शरीर का गुण नहीं है।
2.
चार्वाक दर्शन कहता है कि यदि चैतन्य
(आत्मा) शरीर का गुण न होता तो इसकी सत्ता भी शरीर से अलग दिखाई देती। लेकिन शरीर
के साथ ही चैतन्य (आत्मा) दिखाई देता है। शरीर से अलग चैतन्य के अस्तित्व की
कल्पना नहीं की जा सकती, इसलिए चार्वाक दर्शन के मुताबिक चैतन्य शरीर का गुण है।
भारतीय
दार्शनिक चार्वाक दर्शन के इस मत को असत्य मानते हए कहते हैं कि चार्वाक के उपरोत
कथन से केवल शरीर के चैतन्य (आत्मा) का आधार होना ज्ञात होता है न कि चैतन्य का
शरीर का गुण होना।
3.
यदि चैतन्य (आत्मा) शरीर का गुण होता तो यह
वस्तुनिष्ठ या स्थूल होता। हर आदमी में चेतना स्वरूप का ज्ञान एक जैसा होता लेकिन
व्यावहारिक तौर पर चेतना का ज्ञान वैयक्तिक प्रकार का होता है। एक व्यक्ति की
चेतना से दूसरे आदमी को नहीं जाना जा सकता
4.
यदि चेतना (आत्मा) शरीर का गुण होती तो
अन्य भौतिक चीजों की तरह वह भी प्रत्यक्ष नजर आती। लेकिन चेतना को शरीर या भौतिक
चीजों की तरह न किसी ने देखा है, न सुना है, न सूंघा है, स्वाद लिया है और स्पर्श
ही किया है।
5.
चार्वाक के मुताबिक प्रत्यक्ष ज्ञान का
इकलौता साधन है। लेकिन प्रत्यक्ष से यह पता नहीं लग सकता कि आत्मा नहीं है या उसका
अस्तित्व नहीं है। यद्यपि प्रत्यक्ष के द्वारा आत्मा के अस्तित्व का पता नहीं लगता
लेकिन इससे आत्मा के अस्तित्व को स्वीकारा नहीं जा सकता। प्रत्यक्ष का ज्ञान कभी
आत्मा के अस्तित्व को प्रमाणित नहीं कर सकता लेकिन आत्मा नहीं है, इस बात को भी
प्रत्यक्ष द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता।
6.
अगर शरीर चेतना का गुण है तो शरीर की
चेतना का ज्ञान किसको होता है? एक आदमी की चेतना को दूसरे आदमी द्वारा नहीं जाना
जा सकता। केवल आत्मा सम्बन्धी विचार ही नहीं बल्कि चार्वाक दर्शन के ईश्वर
सम्बन्धी विचार भी दोष वाले हैं। चार्वाक दर्शन कहता है-"ईश्वर दिखाई नहीं
देता, उसका प्रत्यक्ष नहीं होता। इसलिए ईश्वर नहीं है।"
लेकिन
कोई वस्तु अप्रत्यक्ष है या दिखाई नहीं देती, इसलिए उसके अस्तित्व को ही अस्वीकार
कर देना ठीक नहीं है। चार्वाक जब कहते हैं कि “ईश्वर नहीं है” तो इस कथन में वह
प्रत्यक्ष ज्ञान की सीमा से बाहर जाकर अनुमान का सहारा लेते हैं।
अनुमान
के तीन वाक्य होते हैं-
(1)
सभी अप्रत्यक्ष चीजों का अस्तित्व नहीं है।
(2)
ईश्वर प्रत्यक्ष है। इसलिए
(3)
ईश्वर का अस्तित्व नहीं है।
ईश्वर
नहीं है, यह बात चार्वाक ने अनुमान से मानी है इसलिए यह बात भी असंगत माननी चाहिए।
जब चार्वाक की नजर में अनुमान असंगत गलत है तो चार्वाक का यह कथन सही कैसे हो सकता
है?
चार्वाक दर्शन ईश्वर को नहीं मानता लेकिन
व्यावहारिक तौर पर ईश्वर का विचार कहीं न कहीं हर आदमी के अन्दर रहता है। चाहे हम
ईश्वर को चेतन रूप में माने या न मानें। जो लोग ईश्वर का खण्डन करते हैं, वे भी
दुनिया की परेशानियों को झेलते समय ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं।
जब
चार्वाक कहता है कि 'ईश्वर नहीं है’ तब इसके इस कथन से ईश्वर की सत्ता स्वत: ही
सिद्ध हो जाती है। किसी चीज के निषेध में उस चीज का विधान अपने आप हो जाता है।
चार्वाक
दर्शन निकृष्ट प्रकार के स्वार्थवादी सुखवाद को मानता है। इसके मुताबिक हर आदमी को
ज्यादा से ज्यादा निजी सुख भी इच्छा मन में रखनी चाहिए। लेकिन इस मत के विरुद्ध
आक्षेप लगाने वाले दार्शनिकों का कहना है कि यदि हम हमेशा सुख पाने की चिन्ता करते
रहेंगे तो सुख को नहीं पा सकते इसलिए सुख को भूल जाना ही सुख प्राप्ति का
सर्वश्रेष्ठ तरीका है।
जब
व्यक्ति पूर्णतः स्वार्थी हो तभी वह निजी सुख की हमेशा कामना करता है, लेकिन मानव
के अन्दर स्वार्थ की भावना के साथ कहीं न कहीं परमार्थ की भावना भी होती है ।
प्राय: माँ बाप अपने बच्चों के सुख के लिए अपने सुख का भी त्याग कर देते हैं। देश
भक्त लोग अपने देश की रक्षा के लिए अपने जीवन को भी कुर्बान कर देते हैं। मनुष्य के
कई कार्य दूसरों को सुख पहुँचाने हेतु होते हैं। इसलिए यह कहना ठीक नहीं है कि आदमी
को केवल अपने ही सुख की कामना करनी चाहिए।
चार्वाक
दर्शन सभी सुखों को एक ही जैसा मानता है लेकिन संसार के सभी सुख एक जैसे नहीं
होते। कुछ सुख उच्च कोटि के होते हैं और कुछ निम्न कोटि के होते हैं। शराब पीने से
जो सुख मिलता है, वह अध्ययन से प्राप्त सुख से अलग होता है। एक कलाकार या सर्जक
अपनी कला का सृजन या रचना करता है तो उसका सुख शारीरिक सुख से ऊँचा माना जाता है।
दार्शनिकों
का मानना है कि अगर चार्वाक दर्शन के सुखवाद को ही माना जाए तो। किसी प्रकार का
समरूपी नैतिक मापदण्ड निर्मित नहीं हो पाएगा।
चार्वाक
का कथन है कि जिस कर्म से सुख मिले, वह शुभ है और जिस कर्म से दुःख मिले, वह अशुभ
होता है। लेकिन यह सही नहीं है। सुख दु:ख निजी प्रकार के होते हैं। किसी व्यक्ति
को एक कर्म से सुख मिलता है। दूसरे व्यक्ति को उसी कर्म से दुःख प्राप्त होता है।
आस्थावादी
दार्शनिकों के मुताबिक चार्वाक दर्शन को सुखवादी विचारों से समाज का उत्थान नहीं
हो सकता। समाज का तो उत्थान या भला तभी हो सकता है जब समाज लोग अपनी स्वार्थ
सिद्धि को छोड़कर दूसरों के लिए अपने सुख का त्याग करना सीखे. सुख के लिए जो मन में
आए वह करना चाहिए- चार्वाक के ऐसे विचार समाज के लिए घातक हैं।
चार्वाक
के आचार शास्त्र को कभी नैतिक शास्त्र नहीं कहा जा सकता। प्राय: आत्म नियंत्रण को
नैतिकता का आधार माना जाता है। लेकिन चार्वाक आत्म नियंत्रण या आत्मानुशासन के
बजाय आत्म भोग पर जोर देता है। धर्म-अधर्म और पाप-पुण्य का इसके आचार शास्त्र में
कोई स्थान नहीं है। आत्म संयम भी उसको मान्य नहीं है। उसने नैतिकता की जगह दुराचार
को उचित ठहराया है।
चार्वाक
दर्शन का आगे चलकर पतन हो गया था। इसका मुख्य कारण इस दर्शन का निकृष्ट स्वार्थ
मूलक सुखवाद ही था। इस तरह के सुखवाद के अन्तर्गत चार्वाक पाशविक सुख अपनाने पर बल
देता है।
यह
सही है कि इंसान अपने सुख की इच्छा करता है लेकिन केवल शारीरिक सुख चाहना भी ठीक
नहीं है। चार्वाक केवल खाने-पीने और इन्द्रियों के सुख को ही सुखवाद का प्रमुख अंग
मानता है। वह नैतिकता का पालन जरूरी नहीं समझता।।
लेकिन
यह सत्य है कि नैतिकता का पालन किए बिना आदमी अपने जीवन को सुचारु रूप से नहीं चला
सकता। उसे जीवन के मूल्यों में विश्वास करना ही होगा। मूल्यों के अभाव में मानवीय
जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। ऐसा जीवन पशु तुल्य हो जाता है। चार्वाक दर्शन
में मूल्यों की अवहेलना की गयी है। यही कारण है कि यह दर्शन जनसमाज में ज्यादा
लोकप्रिय नहीं हो सका है।
चार्वाक
ने ब्राह्मणों की कटु आलोचना की थी जबकि उस प्राचीन समय में ब्राह्मण लोगों का
बोलबाला था और समाज में उनको ऊँचा माना जाता था। ब्राह्मणों ने चार्वाक दर्शन की
सैकड़ों कमियाँ निकाल कर उसकी जड़ें खोद डाली। इस कारण चार्वाक दर्शन पतन को
प्राप्त हुआ।
चार्वाक
ने भारतीय दर्शन के सामान्य लक्षणों का खण्डन किया था। उसने आत्मा, ईश्वर, मोक्ष,
पुनर्जन्म तथा कर्म सिद्धान्त को अस्वीकार किया। भारतीय वातावरण में जन्म लेकर भी
यह दर्शन भारतीय विचार और संस्कृति से अछूता रहा। परिणाम यह हुआ कि इस दर्शन का
शीघ्र ही पतन हो गया।
चार्वाक
दर्शन के पतन का मुख्य कारण मूल्यों का खण्डन करना था। चार्वाक दर्शन में जीवन
मूल्यों के प्रति अरुचि प्रकट की गयी, इसलिए इस दर्शन की अधोगति हुई।
चार्वाक विचारधारा का भारतीय दार्शनिक परंपरा में महत्व:-
भारत
में चार्वाक दर्शन को निदंनीय माना जाता है। भारत के हरेक दार्शनिक ने इस दर्शन का
प्रबल शब्दों में खण्डन किया है और उसे घृणा योग्य बताया है।
चार्वाक
दर्शन को घृणित कहना ठीक नहीं है। अन्य भारतीय दर्शनों की तरह इस नास्तिकतावादी
दर्शन का योगदान भी भारतीय संस्कृति में कम नहीं है। इस दर्शन ने भारतीय दर्शन के
विकास में मदद की है। भारतीय दर्शन के सारे लक्षणों का यह खण्डन करता है। स्वर्ग,
नरक और ईश्वर आदि के प्रति यह दर्शन विद्रोही भाव अपनाता है। चार्वाक ने हर चीज को
संशय की दृष्टि से देखा। इससे आगामी दार्शनिकों के सामने समस्या खड़ी हुई। हर
भारतीय दर्शन ने चार्वाक के आक्षेपों का उत्तर देने का प्रयास किया। इससे भारतीय
दर्शन और भी ज्यादा समृद्ध हुआ। परिणाम यह हुआ कि भारतीय दर्शन हठवादी होने से
बचा।
भारतीय
दर्शन के समीक्षात्मक दृष्टिकोण का विकास चार्वाक दर्शन के प्रयासों से ही हो सका
है। यदि चार्वाक दर्शन न होता तो भारतीय दर्शन कुछ और ही होता। जैसे ह्यूम
दार्शनिक के संशयवाद ने पश्चिम के दार्शनिकों को हठवादी होने से बचाया था, वही काम
पहले चार्वाक दर्शन, भारतीय दर्शन के लिए कर चुका था।
भारत
में चार्वाक-दर्शन एक ऐसे युग में विकसित हुआ जब यहाँ चारों ओर अन्ध-विश्वास तथा
रुढ़िवादिता फैला चुकी थी। कई बातें हमारे देश में परम्परागत होने के कारण ठीक
मानी जाती थीं। ब्राह्मणों की तो चारों ओर प्रशंसा वंदना होती रहती थी और उनके
विचारों को ईश्वर की वाणी की तरह माना जाता था। लोगों में अपने स्वतंत्र मत
तथा
स्वतंत्र विचारों का अभाव था। वाणी होते हुए भी वे लोग गूंगे जैसे थे। चार्वाक ने ऐसे
अन्धकारमय युग में प्रचलित अन्धविश्वासों के विरुद्ध आवाज उठाई। यह दर्शन लकीर का
फकीर न बना। आँख मूदकर बात को मानने के खिलाफ चार्वाक ने विद्रोह किया। पूज्य
ब्राह्मण वर्ग के विरुद्ध कठोर रुख अपनाया। उनकी कमजोरियों को सारी जनता के बीच
रखा। चार्वाक दर्शन ने ब्राह्मणों की उन्हीं बातों को सही मानने का आदेश दिया जो
कि विवेक संगत थीं।
चार्वाक
दर्शन स्वतंत्र विचारों वाला दर्शन था। इस दर्शन ने उस समय के इंसान को कई प्रकार
के दबावों से मुक्ति दिलाई । यह इस निरीश्वरवादी दर्शन की अनमोल देन है।
चार्वाक
दर्शन के समय उसके सुखवाद की चारों तरफ निन्दा की गयी थी। चार्वाक ने सुख को जीवन
का मुख्य लक्ष्य माना इसलिए भारत में इस दर्शन के प्रति घृणा प्रकट की गयी। लेकिन
एक नजरिए से देखा जाए तो सुख को जीवन का लक्ष्य मानना घृणा की बात नहीं है। कारण
यह है कि दुनिया का हर आदमी किसी न किसी रूप से सुख की कामना या इच्छा मन में रखता
ही है, चाहे वह शारीरिक सुख हो, भौतिक वस्तुओं का सुख हो, मानसिक या बौद्धिक सुख
क्यों न हो। एक राष्ट्रभक्त व्यक्ति जब अपने आपको देश पर न्यौछावर करता है तो
इसमें भी उसको सुख मिलता है। एक संन्यासी व्यक्ति सुख की इच्छा से संसार को
त्यागता है। पाश्चात्य दार्शनिक मिल और बेन्थम ने भी सुख को जीवन का उद्देश्य माना
है। ये दार्शनिक कहीं भी घृणा के पात्र नहीं समझे जाते. फिर चार्वाक के प्रति ही
नफरत क्यों रखी जाती है?
इसका
कारण चार्वाक दर्शन का सुखवाद ही है। चार्वाक ने इन्द्रिय सुख और स्वार्थ सुख को अपनाने
की बात कही है। वह कहता है कि इंसान को ज्यादा से ज्यादा निजी सुख प्राप्त करने
चाहिए। उसे भूत भविष्य की चिन्ता न करके वर्तमान का भरपूर सुख लेने का प्रयास करना
चाहिए।
इन्द्रिय
सुख और स्वार्थ सुख पर जरूरत से ज्यादा जोर देने के कारण चार्वाक दर्शन हमारे भारत
देश में घृणा का विषय हो गया है। लेकिन सभी चार्वाक (अनुयायी) इन्द्रिय सुख की
इच्छा नहीं रखते हैं। सुखवाद को लेकर चार्वाक के निम्न दो समुदाय हैं।
(1)
धूर्त चार्वाक तथा
(2)
सुशिक्षित चार्वाक।
धूर्त
चार्वाक शारीरिक सुख को प्रधान मानते हैं। जबकि सुशिक्षित, चार्वाक निम्न कोटि का
सुखवाद स्वीकार नहीं करते। वे सुखों के बीच गुणात्मक भेद को मानते हैं। सुशिक्षित
चार्वाक ऐसा मानते हैं कि मदिरा पान से प्राप्त सुख अध्ययन से मिले सुख की अपेक्षा
निकृष्ट या तुच्छ है।
राधाकृष्णन के मतानुसार चार्वाक दर्शन में
अतीत काल के विचारों से, जो उस युग को दबा रहे थे, मुक्त
करने का भीषण प्रयास पाते हैं। चार्वाक विचारधारा ने परंपरागत अंधविश्वास व रूढ़िवादी
विश्वासों का एवं ब्राह्मण वर्ग की कमजोरियों का खंडन करके ह्यूम के भाँति भारतीय
दर्शन को हठवादिता से बचाया है। भारतीय दर्शन में समीक्षात्मक दृष्टिकोण का विकास
चार्वाक दर्शन की ही देन है। सुशिक्षित चार्वाक धूर्त चार्वाकों की अपेक्षा उच्च
कोटि के सुखों तथा नैतिकता में भी विश्वास करते हैं। अतः दूसरे दर्शनों में चार्वाक
का जो चित्र उपस्थित हुआ है वह अतिशयोक्तिपूर्ण है। तार्किक प्रत्यक्षवाद की भांति
वस्तुतः चार्वाक दर्शन ज्ञान की प्रामाणिकता को अनुभव क्षेत्र (प्रत्यक्ष अनुभव)
पर आधारित करके वस्तुतः भारतीय दर्शन का उपकार ही करता है।
चार्वाक
मत के कुछ अनुयायी आत्म संयम पर जोर देते हैं। उन्होंने 64 कलाओं के विकास में अपनी
पर्याप्त मदद दी है। नैतिकता पर भी उनको विश्वास है और काम, अर्थ के अलावा धर्म को
भी वे जीवन का आदर्श मानते हैं। इस प्रकार सुख को जीवन का मुख्य लक्ष्य मानने वाले
सभी चार्वाकों को घृणित नहीं समझा जा सकता।
ईश्वर,
आत्मा, स्वर्ग, नरक आदि सत्ताओं का खण्डन करने की जो युक्तियाँ चार्वाक ने दी है,
उनको चुनौती देना बड़ा ही कठिन है। प्रो. हिरियन्ना मानते हैं कि सैद्धान्तिक रूप से चार्वाक का
दृष्टिकोण खण्डन से परे हैं।
भारत
दर्शन में चार्वाक के ज्ञान शास्त्र का अपना महत्त्व है। चार्वाक अनुमान को अप्रामाणिक
बतलाता है। केवल यही नहीं, अनुमान के विरुद्ध इस दर्शन में जो युक्तियाँ पेश की
गयी हैं, वे सचमुच सराहनीय है।
यह
ठीक है कि अब तक चार्वाक दर्शन भारतीय विचारधारा में काफी निन्दा का विषय रहा है।
अन्य दर्शनों ने इस दर्शन के दोषों को बढ़ाचढ़ा कर पेश किया है। तथापि चार्व़ाक
दर्शन का भारतीय दर्शन में अपना एक अलग महत्व हैं।
आलोचना:
चार्वाक के नीति विचारों में जीवन के उच्च
आदशों एवं मूल्यों को महत्व व स्थान नहीं दिया गया है।
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