समकालीन पाश्चात्य दर्शन का संक्षिप्त परिचय
एम. ए. फाइनल (दर्शनशास्त्र) बृज विश्वविद्यालय के सिलेबस में सामान्यतः बीसवीं शताब्दी के कुछ प्रमुख दार्शनिक विचारों का परिचय प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया गया है जैसे
Section : A
Bradley:1846-1924, England
Appearance and Reality (आभास एवं सत्) : Digress of Truth and Reality (सत्य और यथार्थता के मात्रा-भेद), Doctrine of Internal Relations.(आंतरिक संबंध का सिद्धांत)
Bertrand Russell : 1872-1919 Cambridge, England
Criticism of the Doctrine of Internal Relations (आंतरिक संबंध के सिद्धांत की आलोचना), Theory of Knowledge (ज्ञान का सिद्धांत), Theory of Description (विवरण सिद्धांत) , Theory of Types(प्रारूप सिद्धांत), Logical Atomism.(तार्किक परमाणुवाद)
G. E. Moore: 1873-1956 Cambridge, England
Refutation of Idealism(प्रत्ययवाद का खण्डन), Defence of Common-sense (सामान्य ज्ञान का बचाव), Distinction between Meaning and Analysis.(अर्थ और विश्लेषण के बीच अन्तर)
Section : B
Wittgenstein 1889-1951 Birth in Vienna, later from Cambridge, England
Concept of Philosophy(दर्शन का स्वरूप), Philosophy and Language, Meaning and Use.(दर्शन एवं भाषा, अर्थ और प्रयोग)
Carnap 1891-1970 German later lived in USA and Ayer 1910-1989. London, United Kingdom
Theory of Meaning (अर्थ का सिद्धांत या सत्यापनीयता का सिद्धांत), Elimination of Metaphysics.(तत्वमीमांसा का निरसन)
James:-1842-1909 America
Criticism of Absolutism(निरपेक्ष प्रत्ययवाद का खण्डन), Rationalism and Empiricism (बुद्धिवाद और अनुभववाद), Pragmatic Theory of Truth(सत्य का उपयोगितावादी सिद्धांत).
Section : C
Marx :- 1818-1883 birth in Germany later lived in England
Criticism of Hegelian Absolutism(हेगेलीय निरपेक्षवाद का खण्डन): Material Priority over Consciousness(चेतना के ऊपर भौतिकता की प्रधानता), Dialectic and Historicity.(द्वन्दात्मकता और ऐतिहासिकता)
Husserl 1859-1938 Germany
Distinctive Features of Phenomenological Approach(फेनोमेनोलॉजी अप्रोच की विशिष्ट विशेषताएं): Method of Epoche (असम्बन्धन की पद्धति), Notion of Consciousness.(चेतना का संप्रत्यय)
Sartre 1905-1980 Paris, France
Existence and Essence(अस्तित्व एवं सार), Man and Freedom for it-self (pour soi) and In-itsel (insoi).मनुष्य एवं चेतन सत् और अचेतन सत् के लिए स्वतंत्रता)
Marcel 1889-1973 Paris, France
Ontological Mystery(तत्वमीमांसीय रहस्यात्मकता), Existence and Human Freedom(अस्तित्व और मानवीय। स्वतंत्रता). Being and Having.(होना और पाना)
उन्नीसवीं शती के अन्त से लेकर वर्तमान समय तक के दर्शन को समकालीन दर्शन (Contemporary philosophy) कहते हैं।
उपर्युक्त सिलेबस में मुख्यतः उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के समकालीन पाश्चात्य दार्शनिक परंपरा के दार्शनिक शामिल है और मुख्यतः 1960 तक प्रचलित दार्शनिक विचारों का विवेचन यहाँ किया गया है। बीसवीं शताब्दी के पहले के जिन विचारकों का प्रसंगानुसार उल्लेख हुआ है। वह अकारण या अपवाद रूप में नहीं हुआ है, बल्कि अनिवार्य रूप में हुआ है।
जैसे अस्तित्ववादी सौरेन किर्केगार्ड उन्नीसवीं शताब्दी के विचारक हैं। किन्तु, उनके जीवन-काल में उनके विचारों को कोई मान्यता नहीं मिल पायी। बीसवीं शताब्दी के तीसरे तथा चौथे दशक में जब अस्तित्ववाद का प्रभाव बढ़ने लगा, तब उनके विचारों का समुचित स्थापन हुआ। इस दृष्टि से विचारक उन्नीसवीं शताब्दी के है किन्तु विचार बीसवीं शताब्दी का है। उपयोगितावाद के प्रणेता पर्स भी बीसवीं शताब्दी के बहुत पहले के विचारक हैं. फिर भी, उपयोगितावाद के दर्शन के किसी विवरण में उनके विचारों का उल्लेख प्रासंगिक ही नहीं, अनिवार्य है। ब्रेडले की तत्व-दर्शन-सम्बन्धी मूल कृति 'Appearance and Reality' का प्रकाशन भी बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ के पहले हो चुका था किन्तु उसमें विकसित विचार बीसवीं शताब्दी के प्रथम चरण में ही प्रतिष्ठित हुए।
पाश्चात्य जगत का इस काल में विकसित दार्शनिक चिन्तन बडा ही समृद्ध रहा है। उन्नीसवीं शताब्दी में दार्शनिक चिन्तन की जो प्रवृत्तियाँ जागी थीं, वे सभी बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में परिपक्व रूप सें स्थापित हो गयीं। अतः उसी काल से इनके विरुद्ध प्रतिक्रियाएँ भी पनपने लगीं। दार्शनिक प्रतिक्रियाओं की यह विशिष्टता है कि वे पूर्णतया निषेधात्मक नहीं होती; उनकी 'खण्डन-प्रक्रिया' में किसी-न-किसी प्रकार की 'मण्डन-प्रवृत्ति' निहित होती ही है। अतः विभिन्न प्रतिक्रियाओं के फलस्वरूप विभिन्न प्रकार के भावात्मक चिन्तन का आविर्भाव हो आया।
लॉक से लेकर कांट और हीगेल तक जिस दार्शनिक विचारधारा का विकास हुआ, 19वीं शती के अंत तक उसे मात्र ऐतिहासिक तथ्य समझा जाने लगा। कांट एवं हीगेल की विचारधारा इस शती के अंत तक पूरे यूरोप में फैल चुकी थी, विशेषकर नव्य हीगेलवादी धारा तो अमेरिका, इंग्लैंड एवं रूस में व्यापक रूप से विकसित हो चुकी थी। उन्नीसवीं शताब्दी का सबसे प्रभावशाली दर्शन हेगेल तथा हेगेल की परम्परा में उत्पन्न हुआ था। हीगेलीय दर्शन में ज्ञानोपलब्धि के लिए तर्क को सर्वोपरि स्थान दिया गया। वास्तविकता तर्कसाध्य है और जो तर्कसाध्य है, वही वास्तविकता है। परस्पर विरोधी, परिवर्तनशील एवं नाम रूप का ऐंद्रिय जगत् भ्रामक है। वास्तविकता अद्वैत है, देशातीत एवं कालातीत है। यह अमूर्त है, इसलिए इसे तर्कशास्त्र, गणित एवं ज्यामिति की पद्धति से ही जाना जा सकता है। इस विचारधारा में अनुभूति, इच्छा एवं संवेदना को तिरस्कृत करने के साथ साथ ऐंद्रिय जगत् का भी निषेध किया गया। इस प्रकार मस्तिष्क एवं हृदय के बीच तनाव काफी बढ़ गया।
इस दर्शन में कल्पित 'निरपेक्ष सत्-विचार' की कल्पना तत्त्व-दर्शन के परिकल्पनात्मक (Speculative) चिन्तन की सबसे बड़ी उड़ान थी। हेगेल तो पूर्णतया प्रज्ञावादी थे, किन्तु सभी प्रत्ययवादी विचारकों ने अपने 'सत्' की कल्पना को शुद्ध प्रज्ञावादी ढाँचे में नहीं ढाला। फलतः इस प्रकार की प्रत्ययवादी परम्परा में पाँच ऐसे बिन्दु स्पष्ट हुए जिनके विरुद्ध प्रतिक्रियाएं स्वाभाविक थीं। वे पांच बिन्दु थे-
प्रत्ययवादी प्रवृत्ति,
प्रज्ञावाद या बुद्धिवाद की अतिशयता,
दर्शन तथा तत्वमीमांसीय चिन्तन का एकीकरण,
परिकल्पनात्मक चिन्तन का बाहुल्य, तथा
इस प्रकार के चिन्तन में निहित कृत्रिमता।
हीगेलीय निरपेक्षवाद के विरूद्ध प्रतिक्रियाएं कुछ जटिल एवं उलझे रूप में हुयीं। कहीं किसी एक बिन्दु के विरुद्ध प्रतिक्रिया हुयी, तो कहीं एक साथ कई बिन्दुओं के विरुद्ध। रोचक तथ्य यह है कि यदि इन प्रतिक्रियाओं की दिशा स्पष्ट की जाये, तो इस काल में विकसित सभी 'दर्शनों' का चित्र उभर आता है। उसी का एक संक्षिप्त प्रयास यहाँ किया जा रहा है।
प्रारम्भ में तो हेगेल के 'प्रज्ञावाद की अतिशयता' के विरुद्ध ही प्रतिक्रिया हुयी; ऐसी प्रतिक्रियाएँ हेगेल की परम्परा के अन्तर्गत भी हुयीं तथा उस परम्परा के बाहर भी। इन लोगों को इस दृष्टि से प्रतिप्रज्ञावादी कह जा सकता है। इसी के अन्तर्गत निरपेक्ष-सत्-विचार के प्रबल समर्थक ब्रेडले आते हैं, तथा उस परम्परा के बाहर की विचारधाराओं में उपयोगितावाद तथा बर्गसां का प्राणतत्ववाद प्रतिप्रज्ञावादी है ।
समकालीन दर्शन का अभ्युदय हीगेलीय निरपेक्षवाद की विचारधारा के विरोध में हुआ। दर्शन का यह युग प्रणाली विरोधी रहा है। यह प्रवृत्ति क्रमश: अराजकता की ओर बढ़ती गई। दूसरे, व्यक्तिगत अनुभवों को अधिक महत्व दिया गया। तत्वमीमांसा पर प्रबल आक्रमण किए गए। इसके लिए किसी स्कूल ने धर्म और मनोविज्ञान का आश्रय लिया, किसी ने अनुभूति का, तो किसी ने विज्ञान और तार्किक विश्लेषण का। फिर तत्वमीमांसा के सिद्धांत नए स्तर पर स्थापित किए गए। सैमुउल अलेक्जैंडर, निकोलाई हार्टमान एवं अल्फ्रेड नार्थ ह्वाइटहेड इसके उदाहरण हैं।
धार्मिक अनुभवों, एवं मनोवैज्ञानिक सत्यों को विलियम जेम्स ने पर्याप्त महत्व दिया। जेम्स ने हीगेल के पूर्वनिर्धांरित एवं गतिहीन जगत् की कटु आलोचना की। उनके अनुसार वास्तविकता परिवर्तनशील है और इसका ज्ञान संवेदनाओं के माध्यम से ही हो सकता है। फलत: चेतना-प्रवाह का सिद्धांत प्रस्तुत किया गया। देश काल की वास्तविकता को ही वास्तविकता स्वीकार कर लिया गया। जेम्स ने "विश्वास की इच्छा" का सिद्धांत प्रतिपादित किया, जिसके अनुसार, विश्वास की कसौटी तथ्य नहीं, सफलता है। इस विचारधारा को व्यावहारिकतावाद या प्रैग्मैटिज्म कहते हैं। इसमें वास्तविकता की जो कल्पना की गई वह व्यापारवाद, अवसरवाद एवं स्वार्थवाद की ओर प्रेरित करती है। जान डिवी, शिलर, चार्ल्स पियर्स और स्वयं जेम्स इस विचारधारा के प्रसिद्ध व्याख्याता थे।
बर्गसां तथा उपयोगितावदी विचारक मात्र प्रतिप्रज्ञावादी नहीं, वे तो प्रत्ययवादी चिन्तन के भी विरुद्ध है। किन्तु 'प्रत्ययवादी दृष्टि' के विरुद्ध जो स्पष्ट प्रतिक्रिया हुयी, वह प्रत्ययवाद के विरोधी सिद्धान्त वास्तववाद या वस्तुवाद की ओर झुक गयी। फ्रांसीसी दार्शनिक हेनरी बर्गसाँ ने जेम्स के दृष्टिकोण की प्रशंसा की। किंतु वे उपयोगिता को बुद्धिजन्य मानते थे। इसलिए उपयोगिता एवं बुद्धि दोनों ज्ञान प्राप्त करने में बाधक बतलाई गईं। बर्गसाँ ने मनन, सहजानुभूति एवं मूल प्रवृत्तियों को महत्व दिया। जीवन एवं परिवर्तन को वास्तविकता के रूप में स्वीकार किया। उनके अनुसार भौतिक जगत, जो देश में स्थित है, बुद्धिगम्य है और काल जिसमें सभी कुछ स्थित है, सहजानुभूतिगम्य है। बर्गसाँ का दर्शन एक तरह से नव्य प्लेटोवादी परंपरा का सुधरा हुआ रूप है। उन्होंने रहस्यवाद का, प्रगति एवं काल की वास्तविकता से समन्वय करने का प्रयत्न किया है।
यूरोप में 'माईनोंग' तथा 'ब्रेन्टानो' जैसे विचारकों ने वास्तववाद की नींव रखीं, अमेरीका में उपयोगितावाद के साथ-साथ यह भी संवरने लगा, तथा इंगलैंड में मूर एवं रसेल ने इसे परवान चढ़ाया। अमेरीकी वास्तववाद आपसी मतभेद के फलस्वरूप दो शाखाओं में विभाजित हो गया, किन्तु दोनों शाखाएँ मूलतः प्रत्ययवाद एवं वास्तववाद के विवाद से उत्पन्न ज्ञानमीमांसीय विवेचनाओं तक ही सीमित रही।
द्वंद्वात्मक भौतिकवाद रूस एवं चीन का राष्ट्रीय दर्शन होने के कारण सबसे अधिक प्रभावशाली दर्शन रहा है, क्योंकि सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक, दोनों पक्षों से उसे जीवन में ग्रहण किया गया। दर्शन शास्त्र का जीवन के लिए ऐसा उपयोग समकालीन समाज में कहीं नहीं है। मार्क्स एवं एंगेल्स ने इसकी स्थापना की, जिसे लेनिन, प्लैखनोव, स्टेलिन एवं माऔत्से तुंग ने आगे विकसित किया।
यहाँ तार्किक भाववाद, प्रतिभासवाद एवं अस्तित्ववाद का संक्षिप्त परिचय देना पर्याप्त होगा। किंतु इसके पहले हमें नव्य टामसवाद पर कुछ शब्द कह देना चाहिए। जाके मेरितें ने टामस एक्वीनास के विचारों का आधुनिकीकरण करने का प्रयत्न किया, किंतु यह दर्शन मूलत: धार्मिक शिक्षाओं पर आधारित है। व्यक्तिवादी प्रवृत्ति से भिन्न होते हुए भी, इसमें ईश्वर के प्रति आत्मसमर्पण की शिक्षा ही महत्वपूर्ण समझी जाती है। इसमें ज्ञानमीमांसा आदि की व्याख्या हुई है, किंतु नैतिक एवं धार्मिक शिक्षाएँ ही सर्वोपरि स्थान पा सकी हैं। फलत: यह कैथालिक चर्च का दर्शन बन कर रह गया। कभी कभी ये अपने को वास्तविक अर्थों में अस्तित्ववादी कहते हैं। किंतु ईश्वर, आत्मा, स्वर्ग आदि की कल्पनाओं को अधिक महत्व देने के कारण वे भौतिक जीवन को तिरस्कृत करते हैं और उन्हें अस्तित्ववादी नहीं कहा जा सकता।
19वीं शती के अंत में जर्मन प्रत्ययवाद के विरुद्ध विद्रोह होने लगे थे। जेम्स और बर्गसाँ के अतिरिक्त तर्कशास्त्रियों ने भी हीगेलीय पद्धति में दोष ढूँढ़ निकाला। यदि एक ओर तार्किक भाववाद (लाजिकल पाजिटिविज्म) भाषीय विश्लेषण के माध्यम से आगे आया तो अस्तित्ववाद नई और जटिल भाषा लेकर उदित हुआ। फ्रैंज ब्रैन्तैनो के विचारों से प्रभावित होकर एडमंड हुसर्ल ने प्रतिभासवाद (फेनोमेनोलाँजी) का सिद्धांत प्रणीत किया। कभी कभी एक ही स्कूल के भीतर मतवैभिन्न्य एवं अस्पष्टता की भरमार मिलती है। एक तरह से मूल प्रवृत्ति प्रणाली विरोधी होने के कारण अराजक एवं अणुवादी रही है।
तार्किक भाववाद (logical positivism) की पृष्ठभूमि में कांत, मिल, माख, ह्यूम इत्यादि का प्रभाव महत्वपूर्ण है। जी.ई. मूर, बर्ट्रेंड रसेल, ह्वाइटहेड एवं आइन्सटीन के भौतिक शास्त्र का प्रभाव भी इस शाखा पर स्पष्टत: लक्षित होता है। किंतु इस स्कूल का संगठन वियना में मोरिट्ज श्लिक (1882-1936) की अध्यक्षता में हुआ। एर्केटनिस (Erkenntnis) इस स्कूल का मुखपत्र था, बाद में इसका नाम "Journal of Unified Science" हो गया। प्राग, कोनिंग्सबर्ग, कोपेनहेगन, पेरिस और कैंब्रिज में इसकी महत्वपूर्ण बैठकें हुईं। अमरीका से इस स्कूल के "International Encyclopaedia of Unified Science" का प्रकाशन हुआ। इस स्कूल के प्रतिनिधि मुख्यतः जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस और अमरीका से रूडाल्फ कार्नेप, हैन्स रीखेनबाख, श्लिक, ओट्टो न्यूराथ, ऐ.जे. आयर, गिलबर्ट राइल, जान विज्डम आदि का नाम महत्वपूर्ण है। लुडविग वित्गीन्सताइन के भाषा संबंधी विश्लेषण का इस स्कूल पर गहरा प्रभाव है। इन सारे व्यक्तियों में परस्पर मतभेद है, फिर भी वे तर्क, गणित और विज्ञान को एक स्वर से वास्तविकता का साधन मानते हैं। तत्वमीमांसा पर इस स्कूल ने घातक आक्रमण किया। तार्किक भाववाद के अनुसार तत्वमीमांसा ने भाषा के नियमों का उल्लंघन किया है। इसलिए उसका विश्लेषण करना आवश्यक है। ""प्रमाणीकरण"" की पद्धति या सत्यापनीयता के सिद्धांत से तत्वमीमांसा का अध्ययन करने के बाद कहा गया कि उसके सारे वाक्य "अर्थहीन" हैं। ईश्वर, आत्मा, अमरता आदि को प्रमाणित नहीं किया जा सकता। दर्शन का काम वास्तविकता की खोज करना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक वाक्यों का अध्ययन करना हे। इस प्रकार कोई भी वाक्य प्रमाणीकरण के सिद्धांत पर खरा उतरता है तो उसे सार्थक कहा जा सकता है, नहीं उतरता तो वह अर्थहीन है। तत्वमीमांसा की समस्याओं को घिसी पिटी समस्याएँ कहकर उड़ा दिया गया। इस प्रकार तार्किक भाववाद अपने मूल रूप में विश्लेषणात्मक दर्शन है। भाषा का तार्किक विश्लेषण इत्यादि सिद्धांतों से लगता है कि तार्किक भाववाद वस्तुवादी विश्लेषण इत्यादि सिद्धांतों से लगता है कि तार्किक भाववाद वस्तुवादी सिद्धांत है। किंतु ज्ञानमीमांसा की दृष्टि से यह बर्कले के आत्मगत प्रत्ययवाद के निकट पड़ता है। यद्यपि यह वैज्ञानिक संकेत, प्रतीक, वाक्यों इत्यादि की शब्दार्थ विज्ञान के अनुसार व्याख्या करता है, तथापि इसे बाह्य जगत् में विश्वास नहीं है। तार्किक भाववाद के अनुसार हमें बाह्य जगत् का ज्ञान नहीं हो सकता। हम सिर्फ अपने संवेदों को जान सकते हैं, बस। गुलाब स्वयं में क्या है, नहीं कहा जा सकता। लेकिन वह लाल है, सुगंधित और कोमल है, यही कहा जा सकता है। जिस गुलाब को हम जानते हैं, वह हमारे संवेदों से निर्मित होता है। यहीं इस दर्शन की सीमा समाप्त होती है।
मूर तथा रसेल ने भी ज्ञानमीमांसीय विवेचनाओं को अत्यधिक महत्व दिया, किन्तु उन्हें यह प्रतीत होता रहा कि ज्ञानमीमांसीय विवेचनाएँ सदा अपने से 'परे' की ओर कुछ संकेत देती रहती हैं। अतः उन दोनों ने अपनी ज्ञानमीमांसीय विवेचनाओं को 'जगत' से सम्बन्धित करने का प्रयत्न किया। इसी प्रयत्न में इन लोगों ने 'इन्द्रिय-प्रदत्त' तथा 'भौतिक वस्तु' के सम्भावित सम्बन्ध पर विचार किया। किन्तु, अपने इस विचार में 'मूर' तथा रसेल भिन्न-भिन्न दिशाओं में अग्रसर हुए । यहाँ भी दोनों 'प्रत्ययवादी दृष्टि' के विरुद्ध ही अपनी भावात्मक संरचना करते रहे, किन्तु, दोनों दो भिन्न भिन्न ढंगों से अग्रसर हुए। मूर ने हर 'ज्ञान' तथा 'विचार' का आधार 'सामान्य ज्ञान' को बना दिया, तथा 'बाह्य जगत' एवं 'अन्य मन' आदि समस्याओं की विवेचना भी इसी विचार के अनुरूप की। रसेल की गणितीय एवं वैज्ञानिक शिक्षा ने उन्हें बाध्य किया कि वे 'सामान्य ज्ञान' को भी उसी परिवेश में बिठायें, क्योंकि उन्हें प्रतीत हुआ कि 'सामान्य ज्ञान' भी वैज्ञानिक सत्यों के द्वारा संवरता, निखरता रहता है, 'विज्ञान' जगत के सम्बन्ध में जानकारी देता है, अतः रसेल ने अपने ज्ञानमीमांसीय उपकरणों के माध्यम से यह देखना चाहा कि 'जगत' के सम्बन्ध में क्या जाना जा सकता है।
'जगत के विषय में क्या जानकारी मिल सकती है?'-यह समस्या केवल रसेल की ही नहीं, उनके सहयोगी ह्वाइटहेड की भी समस्या थी। रसेल के समान उन्हें भी गणित एवं भौतिकी की जानकारी उपलब्ध थी. किन्तु, उन्होंने वैज्ञानिक चिन्तन में भी परिकल्पनात्मक चिन्तन की अनिवार्यता देखी। अतः उन्हें प्रतीत हुआ कि 'तत्वमीमांसा' एवं 'पारम्परिक परिकल्पनात्मक चिन्तन' के विरुद्ध उपयुक्त प्रतिक्रिया तत्त्वमीमांसा का सर्वथा त्याग नहीं, बल्कि ऐसी तत्त्वमीमांसीय व्यवस्था की स्थापना है जो परिकल्पनात्मक चिन्तन को काल्पनिक उडान पर नहीं, बल्कि उसके वैज्ञानिक आधार पर संचरित करे। ऐसा ही प्रयास ह्वाइटहेड ने किया भी।
मूर तथा रसेल ने इससे भिन्न मार्ग अपनाया था। वे दार्शनिक चिन्तन के आधार पर 'भाषा' को आधार बना अपने-अपने ढंग का विश्लेषणात्मक चिन्तन करते रहे। भाषा के आधार पर विश्लेषणात्मक चिन्तन' की विधाओं में कुछ विचारकों ने तत्त्वमीमांसीय एवं परिकल्पनात्मक चिन्तन के स्थान पर एक सर्वथा नवीन चिन्तन की सम्भावना देखी।
उन्होंने समझा कि हेगेल तथा हेगेल की परम्परा के विरुद्ध अभी तक जो प्रतिक्रियाएँ हुई थी, वे सफल मात्र इस कारण नहीं थी, क्योंकि उनमें उस परम्परा के पूर्ण त्याग की स्पष्ट अनुशंसा नहीं थी। अतः उन्होंने समझा कि दार्शनिक चिन्तन के नवीन ढंगों को प्रतिष्ठित करने के लिए तत्त्वमीमांसा का आमूल एवं स्पष्ट निरसन अनिवार्य है। इन लोगों ने यह भी देखा कि "भाषा पर आधृत विश्लेषणात्मक चिन्तन' में ही इस प्रकार के 'निरसन' का एक सहज माध्यम उपलब्ध है। फलतः तार्किक भाववादी विचारक तथा ट्रैक्टेटस के विटगेनस्टीन ने 'भाषा पर आधृत विश्लेषणात्मक चिन्तन' का एक स्वरूप निश्चित किया, तथा उसी आधार पर 'कथनों की अर्थपूर्णता' का एक सिद्धान्त स्थापित करते हुए 'तत्वमीमांसीय कथनों' को अर्थपूर्णता' की सीमा से बाहर कर दिया।
विटगेन्स्टीन ने अपने 'ट्रैक्टेटस' में केवल इतना ही नहीं किया, वे "भाषा पर आधृत विश्लेषण' की हर विधा तथा उनमें निहित सूक्ष्मताओं को स्पष्ट करते रहे। उनके विश्लेषण ने यह भी दिखाया कि कैसे अर्थपूर्ण कथन 'तथ्यों के होने' का चित्रण करते रहे हैं, तथा साथ-साथ यह भी स्पष्ट कर दिया कि जहाँ ऐसा चित्रण नहीं होता, वहाँ 'कथन' कथन ही नहीं होते क्योंकि वे वस्तुत: कुछ कहते नहीं हैं।
'ट्रैक्टेटस' तथा 'तार्किक भाववाद' का तात्कालिक प्रभाव कुछ ऐसा रहा कि उस काल में तत्वमीमांसीय चिन्तन प्रायः उपेक्षित ही हो गया। अब दार्शनिक चिन्तन की जो समस्याएं उभरी, वे सामान्यत: 'ट्रैक्टेटस' में निरूपित समस्यायें थीं। इसका परिणाम यह हुआ कि 'दर्शन की प्रतिक्रियात्मक प्रवृत्ति' जिसका ध्यान 'तत्वमीमांसा' से हट चुका था, अब इन्हीं समस्याओं पर अपना ध्यान केन्द्रित कर बैठी।
विटगेनस्टीन ने स्वयं यही किया। उन्होंने पुनः 'ट्रैक्टेटस' में निरूपित विचारों पर विचार किया तथा उनमें निहित विसंगतियों को समझा। फलतः 'पूर्वकालीन विटगेन्स्टीन' का आलोचक 'उत्तरकालीन विटगेन्स्टीन' बन गया, तथा इसी आलोचना के आधार पर इन्होंने एक सर्वथा नवीन दर्शन का सूत्रपात किया। 'ट्रैक्टेटस' के काल से ही उन्हें यह अवगति थी कि दार्शनिक चिन्तन का केन्द्रीय आधार 'भाषा' ही है। किन्तु 'ट्रैक्टेटस' में जिस प्रकार का विश्लेषण निरूपित हुआ, वह एक विशिष्ट, कृत्रिम भाषा का विश्लेषण बन गया। तार्किक भाववादी विचारकों ने इसी प्रकार एक 'आदर्श भाषा' की स्थापना करने की चेष्टा की, क्योंकि वे समझते थे कि जिस कथन का रूपान्तरण उस भाषा में हो सके बही अर्थपूर्ण हो सकता है । किन्तु, इसके प्रतिक्रिया स्वरूप उत्तरकालीन विटगेन्स्टीन' को लगा कि उस प्रकार का विश्लेषण तो 'विश्लेषण' को बड़ा ही नियमनिष्ठ एवं औपचारिक बना देता है। इस प्रकार के औपचारिक विश्लेषण का क्षेत्र तो अनिवार्यतः बड़ा ही सीमित हो जायेगा, क्योंकि 'भाषीय कथनों की अनन्त सम्भावनाओं को किसी एक भाषा में रूपान्तरित कर लेना असम्भव है। अस: उत्तरकालीन विटगेन्स्टीन ने अब एक सर्वथा नवीन अनौपचारिक विश्लेषण की अनुशंसा की।
विटगेन्स्टीन ने देखा कि इस ढंग से दार्शनिक समस्याओं के साथ सुगमता से जूझा जा सकता है। उन्होंने दिखाया कि सभी दार्शनिक समस्यायें वस्तुतः 'भाषीय प्रयोगों' के कारण उत्पन्न होती हैं। अतः उन्होंने 'भाषीय खेल' का आविष्कार किया। इन खेलों के द्वारा स्पष्ट रूप में दिखाया जा सकता है कि जिन्हें हम 'समस्या' समझते हैं, वे वास्तविक समस्यायें नहीं हैं, वे तो भाषा के गलत प्रयोगों के कारण समस्या के रूप में प्रकट हो गयी है। अतः भाषीय खेल में 'समस्याओं के समाधान' का अर्थ है 'समस्याओं का 'लुप्त हो जाना-समाप्त हो जाना।
उत्तरकालीन विटगेन्स्टीन का दार्शनिक चिन्तन पर बड़ा सबल प्रभाव पड़ा। विचारकों को 'परिकल्पनात्मक विधि' के स्थान पर 'भाषा-विश्लेषण' के रूप में दार्शनिक चिन्तन के लिए एक नई विधि मिल गयी। बाद में विचारकों ने यह भी देखा कि इस विधि से मात्र वही कार्य सम्पन्न नहीं होता जिसका उल्लेख विटगेन्स्टीन ने किया था। इसके प्रयोग से केवल समस्याओं को समाप्त करने का निषेधात्मक कार्य सम्पन्न नहीं होता, बल्कि यह भावात्मक रूप में भी उपयोगी सिद्ध हुआ। इसके प्रयोग से स्पष्टीकरण होता है, अनेकार्थता दूर होती है, तथा नये-नये प्रश्न उभरते हैं। अतः अब इस विधि का नये-नये क्षेत्रों में, नयी-नयी समस्याओं पर प्रयोग होने लगा, तथा उसी क्रम में यह विधि भी परिष्कृत होती गयी। इस प्रकार 'भाषा-विश्लेषण का दर्शन' प्रकाश में आया, जिसका एक रुप राइल के विचारों में स्पष्ट हुआ तथा जिसका परिपक्व रूप आस्टीन के विचारों में स्पष्ट हुआ।
इस चिन्तन की एक विशिष्टता यह रही कि वह तत्वमीमांसीय परिकल्पनात्मक चिन्तन से मूलतः भिन्न हो गया। उस चिन्तन में 'सम्पूर्णता' की व्याख्या होती है, सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान एक सम्पूर्ण व्याख्या में उपलब्ध हो जाता है। इसके विपरीत भाषा-विश्लेषण के दर्शन में विश्लेषण की विधि का प्रयोग भिन्न भिन्न क्षेत्रों में, भिन्न भिन्न समस्याओं पर, पृथक-पृथक रूप में होता है। अतः इसमें एक प्रकार का तदर्थता आ जाती है।
इस प्रकार के दर्शन का प्रभाव सामान्यतः अंग्रेजी-भाषी देशों में बड़ा प्रबल रहा है। किन्तु, यूरोप में, विशेषतः जर्मनी, फांस आदि में प्रतिक्रिया का स्वरूप कुछ भिन्न हो गया। इस प्रतिक्रिया की विशिष्टता यह रही कि इस क्षेत्र के विचारक दार्शनिक चिन्तन के पारम्परिक एवं प्रचलित दोनों ढंगों से असन्तुष्ट रहे। इन लोगों ने देखा कि दार्शनिक चिन्तन को सर्वथा नवीन रूप देने के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि इसके पारम्परिक एवं प्रचलित ढंगों में निहित विसंगतियों की स्पष्ट समझ हो । अतः इन लोगों ने दार्शनिक चिन्तन के मूल में प्रवेश कर उसकी सम्भावित विसंगतियों तथा उसकी यथार्थता दोनों को समझने का प्रयत्न किया, तथा उसी आधार पर अपनी दार्शनिक संरचना की।
यहाँ भी दो शाखायें फूटी। इन दोनों में कहीं-कहीं कुछ सादृश्यता भी रही, किन्तु। सामान्यत: ये दोनों धारायें दो दिशाओं में प्रवाहित हुयीं।
एक नया मार्ग-निर्देश तो एडमण्ड हुसर्रल ने दिया। उन्होंने इस तथ्य को समझा कि हर प्रकार के चिन्तन का मूल, उसका वास्तविक आधार, जिस पर वैचारिक संरचनाएँ होती हैं, वह है जो अनुभूत होता है। चिन्तक को चिन्तन-विषय की जिस ढंग से चेतना होती है, वही वह मूलाधार है जिस पर चिन्तन सर्जित होता है। अत: उनकी स्पष्ट अनुशंसा है कि चिन्तन का वास्तविक क्षेत्र 'चेतना' ही है, तथा चिन्तन का लक्ष्य है चेतना में आद्य-रुप में प्रदत्त विषय को पकड़ना। चिन्तन की ऐसी विधि को परिष्कृत करना 'फैनौमेनोलाजी' के दर्शन का प्राथमिक कार्य बन गया। हुसरल ने इस प्रकार को एक विधि का प्रतिपादन किया।
प्रतिभासवाद (Phenomenology) 19वीं शती की प्रधान दार्शनिक धारा है। मुख्यत: फ्रैंज ब्रैन्तैनो (1838-1917) के विचारों का आधार बनाकर एडमंड हुसर्ल (1859-1938) ने इसे विकसित किया। जर्मनी के बाद इसका प्रभाव सारे यूरोप में फैल गया। मूर (नव्य-यथार्थवादी) (अस्तित्ववादी), हार्टमान (तत्वमीमांसा) इत्यादि पर प्रतिभासवाद का अलग अलग प्रभाव पड़ा। प्रतिभासवादियों में मैक्स शेलर (Max Scheler) का नाम उल्लेखनीय है। इस सिद्धांत के अनुसार दर्शन का प्रतिभास है। प्रतिभास से अर्थ है, जो भी प्रदत्त वस्तु प्रत्यक्षानुभूति का विषय बनती हो। फलत: प्रकृति विज्ञान के विपरीत विशिष्टता अपनाते हुए भी सह प्रत्ययवाद से भी अलग पड़ता है। प्रतिभासवाद, ज्ञानमीमांसा से अध्ययन प्रारंभ नहीं करता। दूसरी विशेषता यह है कि प्रतिभासवाद सारतत्वों को विषयवस्तु के रूप में चुनता है। ये सारतत्व प्रतिभासी आदर्श एवं बोधगम्य होते हैं। ये प्रत्यक्षानुभूति की क्रिया में मन में छूट जाते हैं इसीलिए इसे सारतत्वों का दर्शन भी कहते हैं। एडमंड हुसर्ल, फ्रैंज ब्रैंतैनो के अतिरिक्त, स्कॉलेस्टिसिज्म, नव्य कांटवाद आदि का प्रभाव स्पष्ट है। गणित में उनका विशेष अध्ययन है। प्रतिभासवाद माध्यम से उन्होंने नामवाद, अज्ञेयवाद, भाववाद आदि का खंडन करने का प्रयत्न किया है। हुसर्ल ने अपने अर्थ के सिद्धांत के अनुमान मानसिक प्रत्ययों, बिंबों, अवधारणाओं, घटनाओं, अनुभवों आदि की व्याख्या करने का प्रयत्न किया है। फलत: उनका सिद्धांत अंत में प्रतिभासवादी होकर रह जाता है। प्रतिभासवादी पद्धति को दर्शन के विज्ञान के रूप में विकसित करने के लिए हुसर्ल ने इसे प्रत्यक्षानुभूति से प्राप्त किया है। सामान्य अर्थों में "देखने की क्रिया से" - जिसे वे प्रमुख चेतना कहते हैं जो प्रदत्त वस्तुओं को प्रत्यक्षत: प्रस्तुत करती है। यह मूल वस्तु का ज्ञान प्राप्त करने के लिए अनिवार्य साधन है। प्रतिभासवाद का यह प्रथम नियम है। हम चेतना में वस्तुओं को जिस रूप में देखते हैं, वह उनका अर्थ है, इस प्रदत्त को प्रतिभास कहते हैं, क्योंकि वह चेतना में प्रतिभासित होता है। प्रतिभासवाद में प्रतिभासों के अतिरिक्त किसी अज्ञेय तत्व को महत्व नहीं दिया गया है। फलत: यह आनुभविक या निगमनात्मक पद्धति को महत्व नहीं देता। प्रदत्त की व्याख्या से इसका संबंध है। इस प्रकार सारतत्वों की ओर ही इसका आग्रह होता है। विषयी की क्रिया भी इसके अध्ययन की वस्तु हो सकती है। किंतु सर्वप्रथम अज्ञात, संदेहास्पद, भ्रममूलक वस्तुओं को ही ग्रहण किया जाता है। हुसर्ल के अनुसार प्रत्येक वस्तु में उसका सारतत्व निहित होता है। यद्यपि प्रत्येक वस्तु संभाव्य या अनिश्चित वास्तविकता होती है, फिर भी उसमें सार तत्व होता है, जिसे शुद्ध प्रत्यय कह सकते हैं। इस प्रकार प्रतिभासवाद बौद्धिक सहजानुभूति के माध्यम से सारतत्वों का अध्ययन करता है। अनुभवातीत न्यूनीकरण के माध्यम से इन सारतत्वों की खोज की जाती है। इसी सिद्धांत से "साभिप्रायिकता" (विषय-सापेक्षता) का सिद्धांत भी जुड़ा हुआ है। इसमें चेतना और इसकी क्रियाओं का अध्ययन होता है। हुसर्ल के अनुसार जीव के विभिन्न विभागों से प्रतिभासवाद की सीमा निर्धारित होती है। इसमें से एक है- शुद्ध चेतना। इसे "साभिप्रायिकता" के आधार पर प्राप्त करते हैं। साभिप्रायिकता इस शुद्ध चेतना से संबंधित होती है। प्रेम, आस्वादन, इत्यादि चेतना हैं, ये साभिप्रायिक अनुभव हैं। ये साभिप्रायिक अनुभव जिस वस्तु को ग्रहण करते हैं, उसे संपूर्ण रूप से जान लेते हैं। अनुभव स्वयं शुद्ध क्रिया है। साभिप्रायिक वस्तु और शुद्ध चेतना का साभिप्रायिक संबंध ही यह क्रिया है। इस प्रकार संपूर्ण वास्तविकता शुद्ध क्रिया है। साभिप्रायिक वस्तु और शुद्ध चेतना का साभिप्रायिक संबंध ही यह क्रिया है। इस प्रकार संपूर्ण वास्तविकता शुद्ध क्रिया के रूप में अनुभव प्रवाह है। अनुभव प्रवाह में ही ऐंद्रिय पदार्थ एवं साभिप्रायिक रूप का अंतर स्पष्ट करते हुए, साभिप्रायिक अनुभव प्रक्रिया की गूढ़ व्याख्या करते हैं। अंत में वे प्रत्ययवादी सिद्धांतों के अनुरूप ही अपना सिद्धांत पूर्ण करते हैं।
यूरोपीय प्रतिक्रिया की दूसरी शाखा अस्तित्ववाद के दर्शन में प्रकट हुयी। अस्तित्ववादी विचारकों ने दार्शनिक चिन्तन के पारम्परिक एवं प्रचलित ढंगों के मुल में एक अन्य प्रकार की विसंगति देखी। उन्होंने देखा कि दार्शनिक चिन्तन या तो भावों-विचारों के खेल में उलझा रहा है, या भाषीय सूक्ष्मताओं के विश्लेषण में। इस प्रकार का चिन्तन अस्तित्व की यथार्थताओं से दूर हट जाता है, तथा उनके स्थान पर 'एक कृत्रिम जगत' के खेल में डूब जाता है। दार्शनिक चिन्तन के ढंगों में निहित इस कृत्रिमता के विरुद्ध अस्तित्ववाद एक प्रतिवाद है। वह दार्शनिक चिन्तन को जीवन तथा अस्तित्व की वास्तविकताओं के साथ जोड़ने का प्रयत्न करता है। अत: अस्तित्ववादी चिन्तन का केन्द्र 'मानव-अस्तित्व' बन जाता है।
अस्तित्ववाद (existentialism) का उदय द्वितीय महायुद्ध के बाद हुआ। किंतु इस परंपरा में रोमांटिक कवि, साहित्यकार एवं विचारकों का नाम लिया जा सकता है। सारैन किर्कगार्ड (1813-1855) ने हीगेल के सिद्धांतों पर निरंतर आक्रमण किया। किर्कगार्ड ने सर्वभक्षी निरपेक्ष प्रत्यय से व्यक्ति को सुरक्षित करने का प्रयास किया। उनके अनुसार अस्तित्व प्रथम है, सारतत्व गौण है। तर्क से वास्तविकता का ज्ञान असंभव है। इसके लिए विश्वास, प्रेम, अनुभूति आदि की जरूरत है। प्रतिविवेकवाद की नींव किर्कगार्ड ने डाली, इसी पर पूरा अस्तित्ववाद खड़ा हुआ। इस सन्दर्भ में नीत्शे का नाम भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। वैसे इस वाद पर हुसर्ल, बर्गसाँ, डिल्थी का व्यापक प्रभाव है। इस स्कूल के प्रधान व्याख्याता हेडगर, मार्सेल, कार्ल यास्पर्स, एवं ज्याँ पाल सात्र हैं। विचारकों ने अपने अपने मत का अधिकतर व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर व्यक्त किया है। किंतु सब में कुछ सामान्य समानताएँ हैं, जिससे वे लोग एक स्कूल के विचारक सिद्ध होते हैं।
अस्तित्ववाद में मृत्यु को दर्शन का आरंभिक बिंदु माना गया है। यास्पर्स के अनुसार दार्शनिकता का अर्थ है यह सीखना कि हम कैसे मृत्यु को प्राप्त हों। हेडगर की "मृत्यु की प्रेरणा" और सात्र का "नासिया" इसके दूसरे रूप हैं। इसी को कहते हैं कि अस्तित्ववाद की समस्या आदमी की अस्तित्वपरक समस्या है। "अस्तित्व" ही इस स्कूल के अनुसार अध्ययन की मूल वस्तु है। अस्तित्व की परिभाषा प्राय: लोगों ने अलग अलग दी है। किंतु इन सबके अनुसार, अस्तित्व आदमी के अस्तित्व के अतिरिक्त कोई दूसरी वस्तु नहीं है। आदमी स्वयं अपना अस्तित्व है। फलत: वह आत्मोन्मुख वास्तविकता है। लेकिन यह वास्तविकता ससीम है। आदमी स्वयं अपना निर्माण करता है और यह निर्माण उसकी स्वतंत्रता सिद्ध करता है। सार्त्र कट्टर नास्तिक है। दूसरे लोग ईश्वर की अलग अलग कल्पना करते हैं। इसके वाबजूद मृत्यु, भय पीड़ा, स्वतंत्रता, असफलता, उत्तरदायित्व इत्यादि की व्याख्या लोगों ने समान अर्थों में की है।
अस्तित्ववाद का मूल स्वर निराशावादी और आशावादी दोनों माना जा सकता है। एक और जीवन के निषेधात्मक पक्षों पर ही उसमें अधिक विचार किया गया है। सामान्यत: यह स्वीकार किया गया है कि आदमी भाग्याधीन है और चरम रूप से वह अपनी परिस्थितियों में निर्धारित है। सात्र के अनुसार मनुष्य स्वतंत्र होने के लिए अभिशप्त है। उनकी अधिकतर परिभाषाएँ अस्पष्ट और गढ़े हुए मुहावरों के कारण असंप्रेषणीय एवं दुरूह होती गई हैं। एक अर्थ में, इसमें अनुभवों का अतिरेक के साथ वर्णन हुआ है। सामाजिक संबंधों का अध्ययन मुख्यत: मनोवैज्ञानिक एवं दार्शनिक स्तर पर किया गया है। अस्तित्ववाद में तत्वमीमांसा को पर्याप्त स्थान मिला है। फलत: प्रत्ययवादी प्रवृत्ति से यह स्कूल मुक्त नहीं हो सका है। यास्पर्स, हेडगर एवं सार्त्र में इसके पर्याप्त उदाहरण वर्तमान है। यास्पर्स तो कांट से काफी प्रभावित हैं।
दूसरी ओर अस्तित्ववाद एक समकालीन आशावादी विचारधारा है, यह व्यक्ति के अस्तित्व तथा उसके स्वतंत्रता पर बल देती है तथा औद्योगीकरण और यंत्रीकरण से हटकर मानव के अंदर मानवता दया, क्षमा तथा अन्य भावनाओं के अस्तित्व और विकास पर बल देती है। अस्तित्ववादियों के अनुसार बुद्धिवाद वास्तविकता की ओर नहीं ले जाता। ज्ञान की उपलब्धि अनुभव के माध्यम से ही हो सकती है। वास्तविकता अनुभूति गम्य है। प्रेम, घृणा, दया, करुणा, हिंसा इत्यादि मनुष्य की वास्तविक अभिव्यक्तियाँ हैं। अपनी लघुता के ज्ञान के साथ ही आदमी अनुभव का महत्व देने लगता है। फलत: अस्तित्ववाद बुद्धिविरोधी दर्शन हैं। यही कारण है कि इसने 19वीं शती के साहित्य को दूर तक प्रभावित किया।
किंतु यह जीवन-दर्शन बन सकने की स्थिति में नहीं आ सका। सार्त्र जैसे अस्तित्ववादी तो अन्त में मार्क्सवाद को वास्तविक जीवनदर्शन स्वीकार करते हैं, लेकिन उसमें स्वतंत्रता को अपनी ओर से जोड़ने का प्रयत्न करते हैं।
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