ईश्वर की धारणा : गुण, मनुष्य एवं विश्व से संबंध ( भारतीय एवं पाश्चात्य)
ईश्वर की धारणा : गुण, मनुष्य एवं विश्व से संबंध ( भारतीय एवं पाश्चात्य)
Notions of God : Attributes, Relation to Man and the World (Indian and Western)
धर्मदर्शन में दार्शनिक विवेचन का एक प्रमुख विषय 'ईश्वर' है। धर्मों में प्राय: ईश्वर को मानवेत्तर पराशक्ति के रूप में वर्णित किया गया है जो कि चेतन शक्ति है। इसे ही विभिन्न धर्मों में सर्वोच्च सत्ता के रूप में स्थापित किया गया है। धर्मदर्शन में इस ईश्वर के संदर्भ में विभिन्न पक्षों की तर्कसंगत विवेचना की जाती है। इसे हम निम्नलिखित पक्षों में बाँटकर देख सकते हैं-
(1) ईश्वर की सत्ता या अस्तित्व संबंधी समस्या
ईश्वरीय अस्तित्व के संदर्भ में तीन प्रमुख अवधारणाएँ दिखायी देती है। ये हैं।
(1) निरीश्वरवाद
(2) अज्ञेयवाद और
(3) ईश्वरवाद
निरीश्वरवाद (Atheism):-निरीश्वरवाद ईश्वर में विश्वास का विरोध करता है। इस रूप में यह ईश्वरवाद का पूर्ण विरोधी सिद्धान्त है। भारतीय दार्शनिक परंपरा में जहाँ चार्वाक, जैन, बौद्ध,सांख्य और मीमांसा दर्शन इस अवधारणा का समर्थन करते हैं, वही पाश्चात्य दर्शन में तार्किक भाववादी, सार्त्र, हाइडेगर एवं नित्से जैसे अस्तित्ववादी, मार्क्स आदि इसका समर्थन करते हैं मानववाद में ईश्वर के विरोध का भाव निहित है। एम एन राय के नवमानववाद में भी निरीश्वरवादी स्थिति दिखाई देती है।।
यहाँ उल्लेखनीय है कि भारतीय निरीश्वरवाद भौतिकतावादी नहीं है (अपवाद चार्वाक)। जैन, बौद्ध आदि दर्शनों में मोक्ष, कर्म-नियम इत्यादि में विश्वास किया गया है। इनमें नैतिक एवं मानवीय मूल्यों की प्रधानता है।
एटकिन्सन ली का कथन है कि "अनीश्वरवाद अनिवार्यतः धर्म विरोधी अथवा अधार्मिक या धर्म का निषेधक नहीं है।“ क्योंकि यहाँ पर भी नैतिकता एवं मूल्यों की बात स्वीकार की जाती है। जैसे- मानववाद जैन, बौद्ध आदि।
(ii) अज्ञेयवाद (Agnosticism) : यहाँ अज्ञेय का आशय है. मानवीय ज्ञान की सीमा से परे होना। इसके अनुसार ईश्वर के सम्बन्ध में हम न तो पूर्ण ज्ञान का दावा कर सकते है और न ही पूर्णत: अज्ञानता का। दूसरे शब्दों में, न तो उसके अस्तित्व को सिद्ध किया जा सकता है, और न ही उसको अनस्तित्व को। इस रूप में अज्ञेयवाद सभी प्रकार के ज्ञान का निषेध नहीं करता। यह शब्द केवल परम तत्व या ईश्वर के ज्ञान की संभावना से इंकार करता है। काण्ट के दर्शन में यह स्थिति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
टी.एच. हक्सले के अनुसार- “ईश्वर हमारे किसी भी ज्ञान का विषय नहीं हो सकता। न तो उसका मंडन संभव है और न ही खण्डन। हर्बर्ट स्पेन्सर ने भी इसका समर्थन किया है। वे अपनी पुस्तक 'First Pinciples’ में कहते है कि विज्ञान का क्षेत्र ज्ञेय जगत से सम्बन्धित है। वहीं धर्म 'अज्ञेय ईश्वर’ से संबंधित है। इसलिए वह अज्ञेय है। संशयवादी निरीश्वरवाद में जहाँ ईश्वर के अस्तित्व पर संदेह किया जाता है, वहीं अज्ञेयवाद में ईश्वर को मानव बुद्धि से परे मानक से अज्ञेय मान लिया है।
अज्ञेयवाद के अनुसार ईश्वर का अस्तित्व हो सकता है, किन्तु तर्कबुद्धि न तो इसे प्रमाणित कर सकती है और न ही अप्रमाणित। इस प्रकार अनेक विचारक अज्ञेयवाद को ईश्वरवाद एवं निरीश्वरवाद के मध्यवर्ती सिद्धान्त को रूप में स्वीकार करते हैं।
अज्ञेयवाद निरीश्वरवाद नहीं है। निरीश्वरवाद ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकार करता है, जबकि अज्ञेयवादी उसके अस्तित्व के विषय में अनभिज्ञता प्रकट करता है।
भारतीय दर्शन में बौद्ध धर्म में भी कई तत्वमीमांसीय प्रश्नों को अज्ञेय कहा गया है तथा उन्हें वाद-विवाद की परिधि से दूर रखा गया। है। इन दार्शनिक प्रश्नों के उत्पन्न होने पर वे दार्शनिकता के साथ मौन हो जाते थे। बौद्ध पालि साहित्य में इन्हें अव्याक्तानि (अव्याकृत प्रश्न) कहा गया है। ऐसे प्रश्नों की संख्या दस मानी गयी है। ये हैं-
(1) क्या यह लोक शाश्वत है?
(2) क्या यह अशाश्वत है?
(3) क्या यह (सान्त) है?
(4) क्या यह अनन्त है?
(5) क्या आत्मा और शरीर एक है?
(6) क्या आत्मा शरीर से भिन्न है?
(7) क्या मृत्यु के बाद तथागत का पुनर्जन्म होता है?
(8) क्या मृत्यु के बाद तथागत का पुनर्जन्म नहीं होता है?
(9) क्या पुनर्जन्म होता भी है और नहीं होता है?
(10) क्या पुनर्जन्म होना और न होना, दोनों ही बातें असत्य है?
बुद्ध के अनुसार इन प्रश्नों का उत्तर निरर्थक है। दार्शनिक दृष्टि से इनका संतोषजनक तार्किक ज्ञान नही मिल सकता। पुनः जीवन के दु:खो को दूर करने के संदर्भ में इन प्रश्नों के उत्तर जानने की आवश्यकता नहीं है।
ईश्वरवाद Theism:- व्यापक अर्थ में प्रत्येक भैंस सिद्धांत जो ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करता है, ईश्वरवाद कहलाता है। इस रूप में निमित्तेश्वरवाद, सर्वेश्वरवाद, अनेकेश्वरवाद आदि सभी ईश्वर संबंधी सिद्धान्त ईश्वरवाद के अंतर्गत आ जाते हैं। पाश्चात्य परम्परा में एक्विनास ,ऑगस्टाइन,प्लेटो,अरस्तू,डेकार्ट,स्पिनोज़ा,लाइबनित्ज आदि ईश्वर को सता को स्वीकार करते है। जबकि भारतीय विचारधारा में न्याय-वैशेषिक दर्शन, रामानुज, मध्वाचार्य आदि इसका समर्थन करते है।
संकीर्ण अर्थ में, ईश्वरवाद एकेश्वरवाद का एकरूप है। इस रूप म यह अनेकेश्वरवाद का विरोधी है। पुन: ईश्वरवाद में ईश्वर को व्यक्तित्वपूर्ण माना जाता है। इस रूप में यह सर्वेश्वरवाद का विरोधी है।
संक्षेप में,
ईश्वरवाद (व्यापक अर्थ) : ईश्वर की सत्ता में विश्वास
निरीश्वरवाद: : ईश्वरीय सत्ता में विश्वास नही।
अज्ञेयवाद। : ईश्वरीय सत्ता के विषय में ज्ञान की असंभावना का प्रकृटीकरण
ईश्वर की संख्या के संबंध में प्रमुख अवधारणाएँ:-
ईश्वर की संख्या के संदर्भ में तीन सिद्धान्त दिखाई देते है। ये है -
(1) अनेकेश्वरवाद (Polytheism) : इस सिद्धान्त के अनुसार ईश्वर एक नहीं है, बल्कि अनेक है। इन अनेक ईश्वरों को आमतौर पर देवी-देवताओ की संज्ञा दी जाती है। अनेकेश्वरवाद धार्मिक विश्वास का आदिम या प्रारम्भिक रूप है। प्रारम्भ में विभिन्न प्राकृतिक शक्तियों के संचालक एवं नियन्ता के रूप में ईश्वर की कल्पना की गई है। प्राचीन ग्रीस में जियूस (Jues) अपोलो (Apollo), सर्व, मर्करी (Mercury) आदि अनेक देवता माने जाते थे। वैदिक धर्म में भी आरंभ में वरुण, अग्नि, सूर्य, चन्द्र आदि देवी-देवताओं की कल्पना की गई।
(2) द्वीश्वरवाद या द्वैतेश्वरवाद (Ditheism) : द्वीश्वरवाद दो स्वतंत्र सत्ताओं अर्थात् दो ईश्वरों में विश्वास करता है। एक ईश्वर वह है जिसमें शुभ की प्रधानता है और दूसरा वह है जो शुभ का विरोध करता है। इस प्रकार इस मत के अनुसार जगत शुभ और अशुभ रूपी दो समान बलशाली शक्तियों के संघर्ष का परिणाम है। जगत में विद्यमान अशुभ की व्याख्या करने के लिए ही द्वीश्वरवाद का सिद्धान्त उत्पन्न हुआ है। एकेश्वरवाद को मानने पर जगत में विद्यमान अशुभ की संगत व्याख्या नहीं हो पाती। जबकि दो ईश्वर को मानने से संसार में विद्यमान शुभ-अशुभ, सुख-दुःख, अच्छाई-बुराई इत्यादि की व्याख्या आसानी से हो जाती है।
पारसी धर्म में द्वीश्वरवाद का साक्ष्य दिखाई देता है। यहाँ दी शक्तियों की कल्पना की गई है- अहुरमज्दाह (Ahure Majdah) जो कि संसार में शुभ और पूर्णता लाने का प्रयास करता है और (2) अहीरिमन (Ahiriman)- यह जगत में विद्यमान अशुभ और दुःख हेतु उत्तरदायी है। इन दोनों में संघर्ष होता है. इसलिए जगत में कभी शुभ होता है तो कभी अशुभ। परन्तु पारसी धर्म यह मानता है कि एक दिन ऐसा आयेगा कि अहुरमज्दाह की विजय होगा और अंततः अहिरिमन का नाश होगा। इस प्रकार प्रारंभिक रुप में यहाँ द्वैतवादी स्थिति है। जबकि अंतिम रूप में एकेश्वरवादी स्थिति उभरती है।
(3) एकेश्वरवाद (Monotheism) : यह एक ईश्वर की सत्ता में विश्वास करता है। एकेश्वरवाद के अनुसार ईश्वर असीम और पूर्ण: है और पूर्णतः उसी पर आश्रित है। यह अवधारणा धार्मिक विश्वास के विकसित स्तर को इंगित करती है। ईसाई , इस्लाम आदि एकेश्वरवादी हैं।
वैदिक धर्म का विकास
बहुदेववाद → एकाधिदेववाद + एकेश्वरवाद → एकत्ववाद
बहुदेववाद : इसका आशय है-अनेक देवताओं की सत्ता स्वीकार करना। यह बैदिक विचारधारा का प्रथम चरण है। चूंकि ऋग्वेद में विभिन्न देवी-देवताओं की स्तुति के लिए मंत्र दिए गए हैं। इससे देवताओं की अनेकता सिद्ध होती है। यहां विभिन्न देवी-देवताओं को प्रकृति के विभिन्न शक्तियों के स्वामी के रूप में स्वीकार किया गया है इसलिए यह अवधारणा प्रकृतिवादी बहुदेववादी कहलाती है।
समस्या
1. अनेक देवताओं को मानने पर इनकी स्वतंत्रता व असीमितता पर आघात होता है। साथ ही इनके मध्य सम्बन्ध की भी व्याख्या स्पष्ट नहीं हो पाती।
2. यहाँ विभिन्न देवता पूर्णत: एक दूसरे से पृथक नहीं है तथा साथ ही इनमें परस्पर विरोध का भाव भी निहित है। जैसे- अग्नि जिसे जलाती है, जल उसे बुझा देता है। जल जिसे गीला करता है, वायु उसे सुखा देती है। स्पष्ट है कि अनेक ईश्वर को मानने पर उनके आपसी संबंध की व्याख्या नहीं हो पाती।
3. इन देवताओं का अपना कोई विशिष्ट व स्पष्ट व्यक्तित्व नहीं है।
एकाधिदैववाद (Henotheism): यह शब्द मैक्समूलर ने दिया है। अवसर विशेष पर उपासना के समय किसी एक देवता को सर्वोच्च या प्रमुख मानकर अन्य देवताओं को गौण स्थान प्रदान करने की प्रवृत्ति को ही एकाधिदैववाद Henotheism या कैथेनोथीज्म (Kathenotheism) कहते है।
• मैक्समूलर के अनुसार यह बहुदेववाद व एकेश्वरवाद के बीच की स्थिति है। यह इनके मध्य के विकास का एक निश्चित सोपान है। ब्लूमफील्ड ने इसे 'अवसरवादी एकेश्वरवाद’ कहा है।
समस्या
1. देवताओं को प्रमुखता में परिवर्तन से उनके प्रति आस्था घटने लगती है।
2. कोई भी देवता पूर्णतः सदैव,सर्वोच्च एवं असीमित रुप से स्थापित नहीं हो पाता है।
एकदैववाद/एकेश्वरवाद:Monotheisms-एक देवता की सत्ता में विश्वास एकदैववाद है।
कारण :
1. प्रकृति के क्रिया-कलाप में एकता व व्यवस्था देखकर यह अवधारणा उभरी कि सभी देवता एक ही दिव्य शक्ति या परम शक्ति के प्रकाश है, विभिन्न रूप है अर्थात देवता एक है परन्तु उसके रूप अनेक है।
2. ऋग्वेद के कई मन्त्र एकेश्वरवाद का समर्थन करते जैसे “एक सद् विप्रा बहुधा वदन्ति। अग्निर्यमं मातरिश्वानमाहुः।“ (ऋग्वेद-1/164/46) अर्थात सत एक ही है परन्तु लोग उसे अनेक मानते हैं। कोई उसे आग्नि कहता है, तो कोई यम और कोई मातरिश्वा अर्थात् वायु कहता है।
समस्या-1. आत्म व अनात्म का भेद विद्यमान है। ईश्वर आत्मरुप है जबकि जगत अनात्मरूप में है। परिणामस्वरूप द्वैत की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
2. एकेश्वरवाद को मानने पर जगत के साथ उसके संबंध की व्याख्या तार्किक एवं संतोषजनक रूप से नहीं हो पाती है।
एकत्ववाद (Monism): जीवन तथा जगत का मूल तत्व एक है। एक ही मौलिक तत्व विश्व के अनेक भौतिक तथा मानसिक पदार्थों के रूप में प्रकट होता है। सारी विविधता या तो उस एक तत्व की ही अभिव्यक्ति है या उसकी प्रतीति। इसीलिए एकतत्ववादी यह मानते हैं कि विविधता के आधार में एक मौलिक एकता है।
- आत्म-अनात्म, ज्ञाता-ज्ञेय का भेद सही नहीं है। कहीं पर भी द्वैत का वास्तविक अस्तित्व नहीं है।
एकतत्ववाद के साक्ष्य
1. अदिति सूक्त - जो कुछ हो चुका है, जो कुछ होने वाला है वह सभी अदिति है। इस प्रकार सम्पूर्ण सत्ता तथा अदिति में अभेद है।।
2. पुरुष सूक्त - इसमें पृथ्वी, अन्य ग्रह-नक्षत्र, चेतन व अचेतन सभी पदार्थों को परम पुरुष का अंश मानकर मूल सत्ता की एकात्मकता स्थापित की गई है।
३. नासदीय सूक्त - इसमें सत्-असत्, जीवन-मृत्यु, पाप-पुण्य, आदि सारे तत्वों को एक हो परम तत्व से विकसित व लय होना बताया गया है। यहाँ परम तत्व के लिए 'तदैकम्' शब्द का प्रयोग किया गया है तथा इस प्रकार यहाँ इसके एकात्मक स्वरूप को स्थापित किया गया है।
एकतत्ववाद की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति कालान्तर में शंकराचार्य के दर्शन में दिखायी देती है। शंकर द्वारा प्रतिपादित दर्शन अद्वैतवाद कहलाता है।
ईश्वरीय स्वरूप के सम्बन्ध में प्रचलित अवधारणाएँ:
ईश्वरीय स्वरूप के संबंध में मुख्यतः तीन अवधारणाएँ प्रचलित है -
(1) ईश्वर की प्रकृतिवादी अवधारणा (Naturalistic Notion or God)
ईश्वर के स्वरूप के सम्बन्ध में प्रचलित विभिन्न अवधारणाओं में ईश्वर की प्रकृतिवादी अवधारणा का महत्त्वपूर्ण स्थान हैं। यह ईश्वर के स्वरूप सम्बन्धी अवधारणाओं के प्रथम एवं आदिम चरण को इंगित करता है।
ईश्वर की प्रकृतिवादी अवधारणा का तात्पर्य प्राकृतिक शक्तियों के रूप में ईश्वर की कल्पना करना है। इसमें प्रकृति अथवा उसके अवयवों (सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, अग्नि आदि) का शक्ति सम्पन्न माना जाता हैं और उनके प्रति श्रद्धा पूजा आराधना इत्यादि की जाती हैं। विश्व की सभी प्राचीन संस्कृतियों में तथा आधुनिक काल में स्पिनोजा के दर्शन के सन्दर्भ में ईश्वर की प्रकृतिवादी अवधारणा दिखाई देती है। स्पिनोजा स्पष्ट रूप से कहते हैं कि ईश्वर ही प्रकृति है और प्रकृति ही ईश्वर है। ईश्वर की इस प्रकृतिवादी अवधारणा का सम्बन्ध प्रकृतिवाद (Naturalism) से न होकर प्राकृतिक धर्म (Naturalistic Religion) से है। प्रकृतिवाद भौतिकवाद का एक प्रकार है जो विश्व की व्याख्या प्राकृतिक नियमों के आधार पर करता है। यह तर्क एवं अनुभव के आधार पर विश्व की व्याख्या करता है। परिणामस्वरूप प्रकृतिवाद अनीश्वरवाद का समर्थन करता है। जबकि दूसरी ओर प्राकृतिक धर्म धार्मिक विकास की प्रारम्भिक अवस्था को द्योतित करता है। साथ ही यह ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास भी करता है।
ईश्वर की प्रकृतिवादी अवधारणा को उत्पत्ति के मूल में प्रायः प्राकृतिक घटनाओं को न समझ पाने के कारण उत्पन्न श्रद्धा और आश्चर्य को माना जाता है। मैक्समूलर के अनुसार- "प्राकृतिक धर्म ही धर्म का मूल रूप है। उनके अनुसार यह धर्म मानव की भावनाओं पर प्रकृति के आश्चर्यजनक प्रभाव का प्रतिफल है।"
आलोचना :
1. यह अवधारणा अतार्किक एवं अविकसित है।
2. यह अवधारणा अनेकेश्वरवादी है। अनेक ईश्वर को मानने पर वे तर्कतः एक दूसरे को सीमित कर देते हैं। कोई भी सर्वशक्तिमान रूप में स्थापित नहीं हो पाता है। फलतः वह ईश्वर चरम रूप में स्वीकार्य नहीं किया जा सकता है।
महत्व: ईश्वर की प्रकृतिवादी अवधारणा प्रकृति-प्रेम एवं प्रकृति के प्रति मनुष्य के सहयोगात्मक प्रवृत्ति को प्रबल करती
है। यह पर्यावरण अनुकूल अवधारणा है।
(2) ईश्वर की व्यक्तित्वपूर्ण अवधारणा (Personalistic Notion of God)
अर्थ स्पष्टीकरण :
ईश्वर के स्वरूप के सम्बन्ध में एक महत्त्वपूर्ण अवधारणा ईश्वर की व्यक्तित्वपूर्ण अवधारणा है। ईश्वर के व्यक्तित्वपूर्णता का तात्पर्य यह है कि ईश्वर आत्मचेतन (Self-conscious) सत्ता है और उसमें संकल्प स्वातंत्र्य (Freedom or will) के साथ-साथ तात्विक और नैतिक गुण असीमित मात्रा में विद्यमान है। यहाँ तात्त्विक गुणों का आशय ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता सर्वव्यापकता, सर्वज्ञता, नित्यता. असीमितता आदि से है। ये गुण ईश्वर के मूल स्वरूप से संबंधित होते हैं। नैतिक गुणों के अन्तर्गत शुभभाव, करुणा, प्रेम, दया, न्याय आदि को समाविष्ट किया जाता है। ये नैतिक गुण ईश्वर के सद्गुणों का वर्णन करते हैं। मैक्टागार्ट के शब्दों में "ईश्वर की व्यक्तित्वपूर्णता का अर्थ है कि वह आत्मचेतन सत्ता है और उसे अपने अस्तित्व का ज्ञान उसी प्रकार है, जिस प्रकार हमें अपने अस्तित्व का ज्ञान है।" प्रो० गैलवे के अनुसार “ईश्वर को स्वचेतन एवं स्वनियन्त्रित सत्ता के रूप में स्वीकार करने पर ईश्वर को अनिवार्यतः व्यक्तित्वपूर्ण सत्ता के रूप में मानना पड़ता है।"
व्यक्तित्वपूर्ण ईश्वर की अवधारणा वस्तुत: सगुण ईश्वर की अवधारणा है। यह अवधारणा विभिन्न प्रचलित धर्मो में पैगम्बरवाद या अवतारवाद के रूप में दिखाई देती है।
पाश्चात्य दर्शन में समर्थकों में प्लेटो, डेकार्ट, लॉक काण्ट आदि हैं. जबकि भारतीय दर्शन में न्याय-वैशेषिक, शंकर (व्यावहारिक दृष्टिकोण से) और वैष्णव वेदान्ती (रामानुज आदि) इस मत के समर्थक है
ईश्वर मानवीय व्यक्तित्व से भिन्न कैसे ?
ईश्वर की व्यक्तित्वपूर्णता सम्बन्धी उपरोक्त अर्थ मानवीय व्यक्तित्व के साधारण अर्थ से भिन्न है। सामान्यत: व्यक्तित्व का तात्पर्य
व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक गुणों के गत्यात्मक संगठन के रुप में लिया जाता है। मानव में व्यक्तित्व का आरोपण उसके इसी सीमित एवं अपूर्ण रूप में होता है। मानव एक अपूर्ण जीव है। उसकी चेतना आंशिक एवं अपूर्ण है। देश-काल में होने के कारण वह सीमित है और शरीरधारी होने कारण यह अनित्य है। दूसरी ओर ईश्वर पर व्यक्तित्व का आरोपण उसकी पूर्णता में तथा विशिष्ट रुप में होता है। वह देश-काल से परे तथा शरीर रहित होने पर भी व्यक्तित्वपूर्ण है।
यहाँ उल्लेखनीय है कि भारतीय दर्शन में विशिष्टाद्वैतवाद के प्रतिपादक रामानुज ईश्वर को व्याक्तित्वपूर्ण मानने के साथ उसे शरीरी भी मानते है। परन्तु उनका यह ईश्वर (विष्णु) इस भौतिक संसार का निवासी न होकर बैकुण्ठ लोक का निवासी है।
ईश्वर को व्यक्तित्वपूर्ण मानने की आवश्यकता क्यों?
1. धार्मिक भावना की सजीवता और क्रियाशीलता के लिए ईश्वर का व्यक्तित्वपूर्ण रहना आवश्यक है क्योंकि व्यक्तित्वपूर्ण ईश्वर ही सर्वगुण सम्पन्न हो सकता है। एक व्यक्तित्वपूर्ण ईश्वर ही भक्तों के स्तुतिज्ञान, प्रार्थना, जप-तप, पूजा आदि के प्रति अनुक्रियाशील हो सकता है। यदि ईश्वर ऐसा न हो तो समस्त धार्मिक गतिविधियाँ ही निरर्थक एवं ठप्प हो जाएगी। इस संदर्भ में जॉन गैलवे का कहना है कि-"धार्मिक अनुभूति को सत्यता ईश्वर के व्यक्तित्वपूर्ण होने पर निर्भर है। यदि ईश्वर में आत्मचेतना नहीं है तो धार्मिकता निरर्थक प्रतीत होती है।
2. धर्म के तीन पक्ष होते है- ज्ञानात्मक, क्रियात्मक और भावनात्मक। इसमें विशेष रुप से क्रियात्मक और भावनात्मक पक्ष का आधार एक व्यक्तित्वपूर्ण ईश्वर ही हो सकता है।
3. ईश्वर को सामान्यतः जगत का सृष्टा माना जाता है। संपूर्ण विश्व उसकी सृष्टि है। मनुष्य उसकी सृष्टि का अत्यन्त महत्वपूर्ण जीव है। अब यदि ईश्वर व्यक्तित्वपूर्ण नहीं होता तो फिर उसके लिये इतना सुव्यवस्थित सृष्टि कर पाना संभव नहीं होता।
4. रविन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार मनुष्य निरपेक्ष सत् मे अभिरुचि तभी ले सकता है जब उसका मानवीयकरण हो जाए। प्रेम दो मानवीय सत्ताओं के बीच सम्भव है। यही कारण है कि टैगोर यह मानते है कि ईश्वर “परम व्यक्तित्व”, “जीवन देवता” या “असीम आत्मपुरूष” है।
ईश्वरीय गुणों की स्थिति (Attributes of God)
व्यक्तित्वपूर्ण ईश्वर को अवधारणा सगुण ईश्वर की अवधारणा है। यहाँ ईश्वरीय गुणों को दो रूपों में वर्गीकृत किया जा सकता है-
(1) तत्वमीमांसीय गुण (Metaphysical Attributes) (2) नैतिक गुण (Ethical Attributes)
(1) तत्वमीमांसीय गुण (Metaphysical Attributes)
तत्वमीमांसीय गुण ईश्वर के मूल स्वरूप को विवेचित करते हैं। ईश्वर के मुख्य तत्वमीमांसीय गुण निम्नलिखित हैं-
(I) सर्वशक्तिमत्ता (Omnipotence)
(II) सर्वज्ञता (Omniscience)
(III) सर्वव्यापकता (Omnipresent),
(IV) नित्यता (Eternity)
(V) असीमिमता या अपरिमितता (Infinity)
सर्वशक्तिमत्ता (Omnipotence)
इसका अभिप्राय है कि ईश्वर में सभी वस्तुओं को उत्पन्न करने उन्हें कायम करने और उन्हें नष्ट करने की क्षमता है। उसमें सब। कुछ करने की क्षमता है। ऐसी स्थिति में ईश्वर को सर्वशक्तिमत्ता के संदर्भ में कुछ प्रश्न उभरने लगते हैं-
(1) क्या ईश्वर वर्गाकार वृत्त बना सकता है?
(2) क्या ईश्वर आत्महत्या कर सकता है?
(3) क्या ईश्वर इतना भारी पत्थर बना सकता है कि जिसे वह स्वयं न उठा सके?
इस प्रकार के प्रश्नों को दार्शनिकों ने ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता के विरोधाभास के रूप में चित्रित किया है, क्योंकि ऐसे प्रश्नों का तर्कसंगत समाधान सम्भव नहीं है। उदाहरणस्वरूप - यदि ईश्वर आत्महत्या कर सकता है तो वह नित्य अथवा शाश्वत नहीं है और यदि वह ऐसा नहीं कर सकता तो फिर वह सर्वशक्तिमान नहीं हैं।
यहाँ धार्मिक व्यक्ति ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता के संदर्भ में तीन अन्य महत्वपूर्ण पक्षों को प्रस्तुत करता हैं_
(1) ईश्वर वही कर सकता है जो तर्कसंगत हो।
(2) ईश्वर को सर्वशक्तिमत्ता को उसके परम उद्देश्यों के अनुरूप होना चाहिए।
(3) ईश्वर की शक्ति को अन्य ईश्वरीय गुणों (प्रेम, दया न्याय आदि) से संगत रहकर ही सोचा जा सकता है।
बर्टोक्सी (PA,Bertocci) का भी कहना है कि सर्वशक्तिमान होने का अर्थ यह नहीं है कि ईश्वर सब कुछ कर सकता है .बल्कि यह है कि ईश्वर वह सब कुछ कर सकता है जो करने योग्य है (Omnipotence does not mean doing all things , but the power of doing all that is worth doing)
सर्वज्ञता (Omniscience) और अग्रज्ञान (Fore-Knowledge)
ईश्वर की सर्वज्ञता का अर्थ है कि वह सब कुछ जानने वाला है। चूंकि उसने सभी वस्तुओं को सृष्टि की है. इसलिए वह सर्वज्ञ है। उसे भूत, वर्तमान और भविष्य की सभी घटनाओं का पूर्ण ज्ञान है।
ईश्वर का यह गुण भी दार्शनिक कठिनाई उत्पन्न करता है।
(1) ईश्वर की सर्वज्ञता और उसकी नित्यता में परस्पर संगति स्थापित करना संभव प्रतीत नहीं होता है।
(2) ईश्वर की सर्वज्ञता का मानव के संकल्प स्वातंत्र्य के साथ संगति स्थापित नहीं हो पाती है।
नित्य होने के कारण ईश्वर अपरिवर्तनशील एवं निर्विकारी है। परन्तु ईश्वर को जिस विश्व का ज्ञान है वह विश्व अनित्य है निरन्तर परिवर्तनशील है। अब यदि ईश्वर इस परिवर्तनशील विश्व के बारे में सब कुछ जानता है तो फिर वह अपरिवर्तनशील कैसे हो सकता है? चूकि ईश्वर विश्व का सतत परिवर्तनशील ज्ञान प्राप्त करता है, अतः हमें मानना होगा कि ईश्वर का ज्ञान भी परिवर्तित होता है अर्थात् उसके स्वरूप में भी परिवर्तन होना अनिवार्य है। परन्तु ऐसा मानना ईश्वर की नित्यता के विरूद्ध है।
• पुनः ईश्वर को सर्वज्ञ मानने पर मनुष्य के संकल्प-स्वातंत्र्य की व्याख्या संगत रूप से नहीं हो पाती। यदि ईश्वर सर्वज्ञ है तो फिर उसे समस्त भावी घटनाओं का निश्चित एवं सत्य ज्ञान होगा। अतः यदि कोई मनुष्य भविष्य में कोई कर्म करता है तो ईश्वर निश्चित ही उससे पूर्व परिचित होगा। अब यदि ईश्वर यह जानता है कि कोई मनुष्य भविष्य में ‘क’ कर्म करेगा तो वह मनुष्य निश्चित रूप से अवश्य ही उस कर्म को करेगा। चूँकि ईश्वर का ज्ञान सत्य है, अतः ऐसी स्थिति में वह मनुष्य भविष्य में 'क' कर्म करने के लिए बाध्य होगा। इससे मनुष्य को संकल्प की स्वतंत्रता बाधित होगी।
इसके प्रत्युत्तर में आगस्टिन का कहना है कि यह ठीक है कि ईश्वर पहले से जानता है कि मनुष्य क्या करेगा और ईश्वर के इस पूर्व ज्ञान में कभी भी धोखा नहीं हो सकता है, परन्तु ईश्वर के इस पूर्व ज्ञान से नैतिक विकल्पों में से किसी एक विकल्प को स्वतंत्र रीति से चुनने की शक्ति मानवों के पास यथावत् बनी रहती है।
दूसरी तरफ बर्गसां. अलेक्जेंडर आदि के अनुसार ईश्वर को मानवों का स्वतंत्र क्रियाओं का पूर्व ज्ञान नहीं हो सकता इनके अनुसार स्वतंत्र प्रक्रिया का अभिप्राय है - पूर्णतः नवीनतम प्रक्रिया। अतः ऐसी स्थिति में जो प्रक्रिया अभी तक नहीं हुई है. उसे पहले से कोई नहीं जान सकता। इस संदर्भ में बर्टौक्सी (RA. Bertorci) का कहना है कि जब तक कोई व्यक्ति नैतिक प्रक्रिया में किसी विकल्प को स्वतंत्र रीति से चुन न ले. तब तक ईश्वर भी पहले से नहीं जान सकता कि वह किस विकल्प को अपनायेगा?
सर्वव्यापकता (Omnipresence)
सर्वव्यापकता का अर्थ है कि ईश्वर जगत में सर्वत्र व्याप्त है। वह ब्रह्माण्ड के कण-कण में उपस्थित है। ईश्वरवादी दृष्टिकोण से ईश्वर को सर्वव्यापक मानना आवश्यक है, क्योंकि ईश्वर को असीम और पूर्ण माना जाता है।
ईश्वर को सर्वव्यापक मानने पर निम्नलिखित कठिनाईयाँ उत्पन्न होती हैं –
1. ईश्वर को शरीर-रहित अभौतिक सत्ता माना जाता है। ऐसी स्थिति में वह भौतिक विश्व में किस प्रकार व्याप्त हो सकता है?
2. ईश्वर को सर्वव्यापक मान लेने पर भक्त एवं ईश्वर का अन्तर समाप्त हो जाता है। धार्मिक गतिविधियों को क्रियाशीलता के दृष्टिकोण से यह कठिनाई पैदा करता है।
3. ईश्वर को सर्वव्यापक मान लेने पर विश्व में विद्यमान अशुभ एवं घृणास्पद वस्तुओं की व्याख्या नहीं हो पाती है।
नित्यता (Eternity)
ईश्वर नित्य एवं शाश्वत है। ईश्वर के संबंध में इस नित्यता शब्द का प्रयोग सामान्यतः दो अर्थो में किया जाता है-
(1) ईश्वर की नित्यता का तात्पर्य है कि वह शाश्वत, अनश्वर, अपरिवर्तनशील एवं अनादि सता है।
(2) ईश्वर कालातीत सत्ता है। वह अन्य वस्तुओं की भांति काल की भी सृष्टि करता है। अत: स्वयं काल का स्रष्टा होने के कारण वह कालातीत है।
यहाँ पहले अर्थ को स्वीकार करने पर हमें यह मानना पड़ेगा कि ईश्वर भक्त के प्रार्थना और उपासना आदि के प्रति अनुक्रियाशील नहीं हो सकता। यदि ईश्वर भक्त की प्रार्थना सुनकर भक्त की इच्छा को पूर्ण करता है तो इससे ईश्वर के स्वरूप में परिवर्तन आयेगा और इससे उसकी नित्यता खंडित होगी। दूसरी ओर यदि वह ऐसा नहीं करता तो इससे उसके नैतिक गुणों पर प्रहार होता है।
यदि ईश्वर को कालातीत माना जाए तो फिर वैसी स्थिति में उसका इस जगत के साथ कोई संबंध नहीं रह पाता। यह स्थिति ईश्वरवादी दृष्टिकोण से घातक है। ऐसा ईश्वर न तो भक्तों की प्रार्थना सुन सकता है और न ही उसके अनुरूप कोई कार्य कर सकता है।
(2) नैतिक गुण (Ethical Attributes)
व्यक्तित्वपूर्ण ईश्वर समस्त नैतिक गुणों से युक्त होता है। ये नैतिक गुण हैं- प्रेम,शुभत्व, परोपकार, न्याय, करूणा आदि। ये नैतिक गुण व्यक्तित्वपूर्ण ईश्वर की अपनी विशिष्टता है जो कि उसमें असीमित मात्रा में पाये जाते हैं। ये ही गुण ईश्वर को पुरुषोत्तम का रूप प्रदान करता है। इन्हीं गुणों के कारण भक्त स्वयं को ईश्वर के निकट लाने का प्रयास करता है। ईश्वर के ये नैतिक गुण ही धार्मिक क्रियाकलापों को जीवन्त बनाते हैं।
आलोचना :
(i) ईश्वर को व्यक्तित्वपूर्ण मानने पर उसे अशुभों से प्रभावित मानना पडेगा। विश्व में अशुभ की उपस्थिति ईश्वर के तात्विक एवं नैतिक गुणों की असीमितता को खण्डित करती है।
(ii) कुछ आलोचकों के अनुसार नैतिक गुण मानव पर लागू होते है। अब यदि ईश्वर में भी इन गुणों का आरोपण किया जाए तो फिर इससे ईश्वर का मानवीकरण होगा। ईश्वर पर शुभत्व, दयालुता, न्यायशीलता प्रेम आदि मानवीय गुणों का आरोपण का अर्थ होगा - ईश्वर को भी मानव के समान सीमित एवं अपूर्ण बनाना। परन्तु ऐसा मानने पर ईश्वर को सर्वोच्च सत्ता के रुप में स्थापित नहीं किया जा सकता।
(iii) ईश्वर पर तात्विक गुणों के आरोपण से नाना प्रकार की विसंगतियाँ उत्पन्न हो जाती है। उदाहरणस्वरूप यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो फिर यह प्रश्न उठता है कि ‘क्या ईश्वर आत्महत्या कर सकता है? ; क्या वह पाप कर सकता है? यदि इन प्रश्नों का उत्तर हाँ में दिया जाए तो फिर ईश्वर की नित्यता या शुभत्व खंडित होता है। और यदि इनका उत्तर नकारात्मक रूप से दिया जाए तो फिर यहाँ आत्म-विरोधाभास उत्पन्न हो जाता है।
(3) ईश्वर की अव्यक्तित्त्वपूर्ण अवधारणा (Impersonalistic Notion of God),
ईश्वरीय स्वरूप के संबंध में एक महत्वपूर्ण अवधारणा ईश्वर की निर्वैयक्तिक अवधारणा है। यहाँ ईश्वर की अव्यक्तित्वपूर्णता का तात्पर्य है कि ईश्वर में इच्छा, कल्पना, प्रयोजन आदि मानवीय व्यक्तित्व के तत्वों का पूर्णतः अभाव है। वह निर्गुण निर्विशेष निराकार और निर्वैयक्तिक है। यहाँ निर्गुण का आशय गुण-रहितता से न होकर गुणातीत सत्ता से है। इस अवधारणा के समर्थकों में पाश्चात्य दार्शनिकों में स्पिनोजा, हीगल, ब्रैडले आदि हैं। भारतीय दार्शनिकों में शंकर पारमार्थिक दृष्टि से इसका समर्थन करते हैं।
मानने का आधार :
ईश्वर को अवैयक्तिक न मानकर व्यक्तित्वपूर्ण माना जाए तो फिर
-ईश्वर तार्किक रूप से सीमित हो जाता है, और ऐसा सीमित ईश्वर न तो उपास्य हो पाता है और न ही चरम रूप में स्थापित।
- अशुभ की तर्कसंगत व्याख्या नहीं हो पाती।
- ईश्वर पर मानवत्व आरोपण का दोष उत्पन्न होता है।
- ईश्वर में विद्यमान गुण विरोधाभासों को जन्म देते हैं।
व्यक्तित्वपूर्ण ईश्वर में विद्यमान इन्हीं दोषों के कारण निर्वैयक्तिक ईश्वर की धारणा उभरकर सामने आयी।
सर्वेश्वरवादी स्पिनोज़ा के अनुसार – ईश्वर या द्रव्य निर्गुण, निराकार, असीम एवं पूर्णतया व्यक्तित्व रहित सत्ता है। इनके अनुसार ईश्वर एक, असीम, पूर्ण,स्वंयभू एवं शाश्वत सत्ता है। ऐसे ईश्वर पर यदि व्यक्तित्व का आरोपण किया जाए तो फिर ईश्वर सीमित हो जायेगा और सीमित होने पर ईश्वर का ईश्वरत्व खंडित होगा। इसीलिए स्पिनोजा कहते हैं- “Every Determination is Negations”।
स्पिनोजा के अनुसार जो सर्व है, उस पर किसी गुण या विषय का आरोपण नहीं किया जा सकता। मानव केवल सीमित गुणों की ही भावना कर सकता है जो निषेधात्मक स्वरूप के होते है। अतः यदि ईश्वर पर इन गुणों का आरोपण किया गया तो उसकी पूर्णता खंडित होगी। इसलिए स्पिनोजा यह कहते है कि ईश्वर अवर्णनीय है।
हीगल के अनुसार निरपेक्ष प्रत्यय व्यक्तित्व रहित है। ईश्वर में विश्वरूप में या जगत के रूप में अभिव्यक्त होने की असीम संभावनाएँ विद्यमान है। यह विश्व ईश्वर की अभिव्यक्ति है परन्तु ईश्वर विश्व में सीमित मात्र नहीं है।
भारतीय दर्शन में वेदों और उपनिषदों में अनेक स्थलों पर कहा गया कि ईश्वर निर्गुण एवं व्यक्तित्वरहित सत्ता है। इस मत का पूर्ण विकास शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त में होता है। अद्वैतवादी शंकराचार्य पारमार्थिक दृष्टिकोण से निर्गुण, निराकार, निर्विशेष ब्रह्म की सत्ता को स्वीकार करते है। इनके अनुसार ऐसे ब्रह्म का भावात्मक वर्णन नहीं किया जा सकता। इसी संदर्भ में शंकराचार्य 'नेति-नेति’ की बात करते है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि शंकराचार्य व्यावहारिक दृष्टिकोण से व्यक्तित्वपूर्ण ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करते हैं। इनके अनुसार सगुण ब्रह्म अर्थात् ईश्वर उपासना का विषय है। उपासना से चित्त की शुद्धि होती है, साधक का नैतिक एवं आध्यात्मिक उत्थान होता है। परिणामस्वरूप वह साधक निर्गुण, निराकार ब्रह्म के साक्षात्कार के योग्य हो जाता है
जहाँ वैयक्तिक ईश्वर की धारणा में भक्त और भगवान का पृथकत्व कायम रहता है, वहीं अवैयक्तिक ईश्वर की अवधारणा में समस्त भेद अन्ततः मिथ्या सिद्ध होते है। निर्वैयक्तिक ईश्वर को अवधारणा में प्रायः अंतिम स्तर पर ब्राह्य सम्बन्ध का अभाव हो जाता है। यहाँ अंततः: भक्त और भगवान के बीच द्वैत समाप्त हो जाता है।
निर्वैयक्तिक ईश्वर की अवधारणा में ईश्वर और जगत के बीच तीन मत दिखाई देते है-
(1) अरस्तू के अनुसार ईश्वर निर्वैयक्तिक है परन्तु विश्वातीत है।
(2) स्पिनोजा को अनुसार ईश्वर निर्वैयक्तिक है और वह जगत् में पूर्णतः विद्यमान है।
(3) हीगल के अनुसार ईश्वर जगत में विद्यमान होने के साथ-साथ उससे परे भी है।
आलोचना:-
(1) यह अवधारणा धार्मिक संकेतों की संतुष्टि एवं धार्मिक जीवन की जीवंतता में बाधक है।
(2) भक्ति मार्ग के लिए यह कठिनाई उत्पन्न कर देता है।
(3) यह अवधारणा अस्पष्टता एवं रहस्यवादिता को बढ़ावा देती है।
(4) स्पिनोजा के सर्वेश्वरवाद में ईश्वर विश्व में पूर्णतः व्याप्त हो जाता है। इससे मनुष्य के संकल्प स्वातंत्र्य पर आघात होता है।
महत्त्व : -
(1) ज्ञान मार्ग के अनुयायी के लिए विशेष रूप से उपयोगी है।
(2) चूँकि इस अवधारणा में ईश्वर को स्तर पर किसी बाह्य संबंध की बात नहीं होती। अतः इससे ब्रह्माण्ड की एकता की व्याख्या अधिक संगत रूप से हो जाती है।
(3) इस अवधारणा में तार्किकता अधिक व धार्मिकता कम है।
ईश्वर-जगत् संबंध (God-World Relation)
धार्मिक संदर्भ में ईश्वर और जगत के संबंध के बीच कई प्रकार के मत विद्यमान हैं। विभिन्न धर्मा एवं दर्शनों में ईश्वर और जगत के मध्य संबंध बताने का प्रयास किया गया है। हम यहाँ ईश्वर और जगत के मध्य संबंध और उससे संबंधित समस्याओं को विभिन्न प्रश्नों के संदर्भ में समझ सकते हैं -
(i) ईश्वर और जगत में कैसा संबंध है?
(ii) ईश्वर जगत की रचना क्यों करता है?
(iii) ईश्वर जगत की रचना कब करता है? या जगत की रचना करते समय ईश्वर की क्या स्थिति थी?
(iv) अवतारवाद
(1) ईश्वर और जगत में कैसा संबंध है तथा इसे किससे बनाया है (पक्ष एवं विपक्ष)
एकेश्वरवाद के समक्ष यह समस्या उत्पन्न होकर आती है कि ईश्वर एवं जगत में कैसा संबंध है? इस संबंध के संदर्भ में तीन प्रमुख स्थितियाँ उभरती हैं -
(i) या तो ईश्वर जगत से परे हो (विश्वातीत)
(ii) या तो ईश्वर जगत में पूर्णतः विद्यमान हो (विश्वव्यापी)
(iii) विश्वव्यापी और विश्वातीत दोनों हों।
(i) केवल निमित्तेश्वरवाद या तटस्थेश्वरवाद या विश्वातीत ईश्वरवाद (Deism)
केवल निमित्तेश्वरवाद एकेश्वरवादी सिद्धान्त है। इसके अनुसार ईश्वर जगत का केवल निमित्त कारण है. उपादान कारण नहीं है। यदि ईश्वर को केवल जगत का निमित्त कारण माना जाए तो फिर वह विश्वातीत माना जाएगा । 16 वीं – 17 वीं शताब्दी में जॉन टालैण्ड, टॉमस चब आदि ने इसका प्रतिपादन किया। न्यूटन, लैपलेस, डार्विन जैसे सुप्रसिद्ध वैज्ञानिकों के भी निमित्तेश्वरवाद का समर्थन किया है। इस सिद्धान्त की पृष्ठभूमि में वैज्ञानिक उत्थान एवं प्रभाव को देखा जा सकता है।
भारतीय दार्शनिक परंपरा में पाश्चात्य तटस्थेश्वरवादी मान्यताओं को स्वीकार नहीं किया गया है परन्तु न्याय-वैशेषिक एवं मध्वाचार्य आदि ईश्वर को केवल निमित्त कारण के रूप में स्वीकार करते हैं। न्याय दर्शन में यह माना गया है कि ईश्वर नित्य परमाणुओं में गति का संचार कर जगत की रचना करते है।
विशेषताएं:(1) ईश्वर व्यक्तित्वपूर्ण, अनन्त व पूर्ण है।
(2) ईश्वर विश्व से परे या विश्वातीत (Transcendent) माना जाता है।।
(3) ईश्वर विश्व का केवल निमित्त कारण है। वहीं विश्व का आदि कारण भी है।
(4) विश्व की सृष्टि शून्य से हुई है।
(5) ईश्वर एक बार संसार का निर्माण कर उससे तटस्थ हो जाता है। आवश्यकता पडने पर ईश्वर संसार की क्रियाशीलता में हस्तक्षेप करता है। यहाँ ईश्वर की तुलना कुशल घडीसाज से की जा सकती है जो घड़ी बनाकर, उसमें गति प्रदान कर उससे अलग हो जाता है। इसी प्रकार संसार भी ईश्वर से निर्मित होकर उसके नियमों द्वारा ही परिचालित होता रहता है। लाइबनित्ज का पूर्व स्थापित सामञ्जस्य के नियम में यह स्थिति दिखाई देती है।
(6) ईश्वर और विश्व में बाह्य संबंध है। अतः संसार की अपूर्णता से वह अछूता है।।
(7) इस सिद्धान्त के अनुसार- जगत स्वतंत्र है और उसमें जड़ और चेतना निहित है। चेतन आत्माओं में स्वतंत्र इच्छा है अर्थात् वह स्वतंत्रतापूर्वक कार्य करती है।
कठिनाईयाँ:
(1) शून्य से संसार की सृष्टि की व्याख्या बोधगम्य नहीं है। शून्य से कुछ की भी उत्पत्ति संभव नहीं है
(2) ईश्वर को विश्व से वाह्य मानने पर धार्मिक भावनाओं, संवेगों एवं गतिविधियों की व्यर्थता सिद्ध होने लगती है।
(3) ईश्वर में सीमितता एवं अपूर्णता का भाव उत्पन्न होता है क्योंकि ईश्वर जब जगत से अलग हो जायेगा जो फिर ईश्वर की सीमा जगत की सीमा से अलग हो जायेगी। ऐसी स्थिति में ईश्वर अपूर्ण हो जायेगा।
(4) इससे ईश्वर के एकत्व भाव एवं सर्वव्यापकता का खंडन होता है क्योंकि इसमें ईश्वर के साथ-साथ अन्य पदार्थों का भी सहअस्तित्व मानना पड़ता है।
(ii) सर्वेश्वरवाद (Pantheism)
जब ईश्वर को जगत का केवल उपादान कारण माना जाता है तो फिर ईश्वर, जगत में पूर्णतः व्याप्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में जगत और ईश्वर में तादात्म्य संबंध माना जाता है। यह स्थिति स्पिनोजा के सर्वेश्वरवाद में दिखाई देती है। स्पिनोजा के अनुसार ईश्वर ही विश्व है और विश्व ही ईश्वर है। स्पिनोजा के अनुसार ईश्वर और विश्व में अनिवार्य, अकालिक, अवियोज्य एव अभेद संबंध है। यहाँ ईश्वर को अव्यक्तित्वपूर्ण माना गया है।
सर्वेश्वरवाद के अनुसार ईश्वर और विश्व में बाह्य संबंध नहीं है। जिस प्रकार समुद्र का अपनी लहरों से संबंध है , उसी प्रकार का संबंध ईश्वर और विश्व में है।
समस्या :
(क) जगत में होने वाले परिवर्तन एवं विनाश की व्याख्या नहीं हो पाती।
(2) पाप और पुण्य की अवधारणा निरर्थक हो जाती है।
(3) मनुष्य की स्वतंत्रता खंडित होती है।
(4) जगत में विद्यमान अशुभ की व्याख्या नहीं।
(iii) निमित्तोपादानेश्वरवाद या आंतरातीत ईश्वरवाद (Panestheism).
इसके अनुसार ईश्वर जगत का निमित्त और उपादान कारण दोनों है। परिणामस्वरूप वह अनुभवातीत और विश्वव्यापी दोनों है। पाश्चात्य दर्शन में हीगल, बर्गसा इत्यादि इसके समर्थक है।
जब ईश्वर को जगत का निमित्त एवं उपादान कारण दोनों माना जाता है तो फिर ईश्वर का विश्वातीत् मानने के साथ-साथ विश्वव्यापी भी मानना पड़ता है। रामानुज और शंकर (व्यावहारिक दृष्टिकोण) के दर्शन में ऐसी स्थिति दिखाई पडती हैं। रामानुज के अनुसार यह जगत ईश्वर के सूक्ष्म रूपों का ही स्थूल अंशों में वास्तविक रूपांतरण है। (ब्रह्म-परिणामवाद)
आलोचना:
(1) जगत में होने वाले परिवर्तन और विकास की संगत व्याख्या नहीं हो पाती। हमें ईश्वरीय अंश मे भी विनाश मानना पडेगा।
(2) जगत में विद्यमान अशुभ ईश्वरीय गुणों में सामंजस्य की समस्या उत्पन्न करता है।
(3) भक्तिमार्ग के लिए यहाँ स्थान शेष नहीं रह जाता।
जगत् मिथ्या है या वास्तविक ?
भारतीय दार्शनिक परंपरा में वेदान्त दर्शन में शंकराचार्य पारमार्थिक स्तर पर जगत को मिथ्या बताते है। ऐसी स्थिति में ब्रह्म और जगत के बीच किसी वास्तविक संबंध को स्वीकार नहीं किया जा सकता। शंकराचार्य केवल व्यवहारिक दृष्टिकोण से माया शक्ति से युक्त ईश्वर के आधार पर जगत की व्याख्या करते हैं।
दूसरी ओर रामानुज ब्रह्म के अंश से जगत की वास्तविक रूपांतरण की व्याख्या कर जगत को सत् रूप में स्थापित करते है। इनके अनुसार ईश्वर और जगत में अपृथक सिद्धि संबंध है। जगत की सत्ता ईश्वर से पृथक और स्वतंत्र नहीं मानी जा सकती।
मध्वाचार्य के दर्शन में जगत यद्यपि ब्रह्म से पृथक रूप में सत है परन्तु वह अपनी सत्ता के लिए ईश्वर के ऊपर निर्भर है। ईश्वर ही एकमात्र स्वतंत्र सत्ता है।
2. ईश्वर जगत की रचना क्यों करता है?
इस संदर्भ में तीन समाधान दिखाई देते हैं।
(1) जीवों के कर्मों का फल प्रदान करने हेतु
2) स्वार्थवश
(3) करुणा से प्रेरित होकर
यदि ईश्वर जगत की सृष्टि जीवों के कर्मों के अनुसार करता है तो फिर इसका आशय यह होगा कि वह जगत की रचना करते समय जीवों के कर्मों के ऊपर निर्भर है। जैसा कि न्याय दर्शन में यह माना गया है कि ईश्वर अदृष्ट के अनुसार जगत की सृष्टि करता है परन्तु ऐसा मानने पर ईश्वर की स्वतंत्रता खंडित हो जाती है। पुनः जब सृष्टि के पूर्व जीव था ही नहीं तो फिर उनके कर्मफल की बात करना भी संगत नहीं है।
यदि ईश्वर जगत की सृष्टि स्वार्थवश करता है तो फिर उस ईश्वर को पूर्ण नहीं माना जा सकता।
यदि ईश्वर जगत की रचना करुणावश करता है तो फिर संसार में अभाव, कष्ट, बुराइयाँ इत्यादि क्यों आती है। इससे ईश्वर की पूर्णता,दयालुता एवं सर्वशक्तिमतता पर प्रहार होता है।
भारतीय दार्शनिक परंपरा में (रामानुज आदि) जगत की सृष्टि को ईश्वर की लीला बताते है जिसे पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।
3. ईश्वर जगत की सृष्टि कब करता है?
यदि ईश्वर जगत की सृष्टि समय या काल में करता है तो फिर हमें यह मानना पड़ेगा कि काल या समय भी ईश्वर क साथ-साथ सहअस्तित्ववान था। इससे ईश्वर का एकत्व भाव खंडित होगा।
यदि ईश्वर जगत की रचना काल के साथ-साथ करता है तो फिर हमें यह मानना पड़ेगा कि “एक समय ऐसा था जब कोई समय नहीं था”। स्पष्ट है कि समय के अभाव की कल्पना समय के संदर्भ में ही की जा सकती है।
4. जगत की रचना करते समय ईश्वर की स्थिति
यदि ईश्वर जगत का सृष्टिकर्ता है तो फिर प्रश्न है कि वह सशरीरी है या अमूर्त। ईश्वर अमूर्त होकर जगत की सृष्टि नहीं कर सकता। अब यदि ईश्वर शरीरी है तो फिर-
-वह हाथ, पैर आदि से युक्त होगा और फ़िर वह विनाशी हो जायेगा
- शरीर हमारे पाप और पुण्य कर्मों का फल होता है। यहाँ प्रश्न यह उठता है कि ईश्वर का शरीर किसका फल है। इसका संगत उत्तर यहाँ नहीं मिलता।
ईश्वरीय स्वरूप में विरोधाभास
जगत की रचना करना एक ऐच्छिक कार्य है। ईश्वर में विश्व की रचना करने को इच्छा उत्पन्न हूई। इच्छा का का उत्पन्न होना परिवर्तन या अभाव को इंगित करता है। परिणामस्वरूप ईश्वर की नित्यता एवं पूर्णता पर प्रहार होता है। रामानुज आदि के अनुसार जगत ईश्वर की लीला है।
5. अवतारवाद
अवतार का अर्थ है- ऊपर से नीचे आना अर्थात् ईश्वरत्व से प्राणी जगत के धरातल पर आन। संक्षेप में , धरती पर भगवान का आगमन ही अवतार है। यह एक प्रकार से धरती पर भगवान का जन्म है। परन्तु चूँकि ईखईश्वर अज (अजन्मा) है , परन्तु वह अज होकर भी जन्म लेता है. इसीलिए उसके जन्म का जन्म न कहकर अवतार कहा जाता है। ईश्वर इस जगत में अवतार लेने के बाद जो कर्म करता है, उसे कर्म न कहकर ईश्वर की लीला का जाता है।
अवतार क्यों होता है?
- धर्म की रक्षा हेतु
-सज्जनों के हित को लिये
- अज्ञानता को दूर कर बंधन से मुक्ति हेतु
- दुष्टों के विनाश हेतु
- स्वधर्म के पालन के प्रेरणा प्रदान करने के लिए
वस्ततः धार्मिक संदर्भ में ईश्वर को जगत का नैतिक व्यवस्थापक माना जाता है। ऐसी स्थिति में जगत में नैतिक व्यवस्था की स्थापना हेतु या अनैतिकता के प्रभाव एवं प्रसार को समाप्त करने हेतु धरती पर उसके आगमन की बात की जाती है। इस्लाम एवं ईसाई आदि परम्परा में ईश्वर अपने वचनों को देवदूतों के माध्यम से धरती पर भेज कर जगत में नैतिक व्यवस्था एवं मार्गदर्शन की बात करता है। वहीं हिन्दू परंपरा में ईश्वर के धरती पर सीधे-सीधे अवतरित होने की बात की गई है। हिन्दु परंपरा में इस संदर्भ में मुख्यतः दशावतार की बात की गई है।
अवतार के साक्ष्य
- सेमैटिक या नबीमूलक धर्मों में पैगम्बर की अवधारणा
-रामानुज के दर्शन में यह माना गया है कि ईश्वर भक्तों पर कृपा करने के लिये स्वंय को पांच रूपों में अभिव्यक्त करता है। रामानुज के अनुसार ईश्वर के पांच रूप ये हैं- पर, व्यूह, विभव, अंतर्यामी, अर्चावतार। इसमें ईश्वर का विभव रुप अवतार है। भारतीय परम्परा में दशावतार की कल्पना दिखाई देती है। यद्यपि भगवान के अनेक अवतार माने गये है, परन्तु उनमें ये दस प्रमुख हैं। ये हैं-
(i) मत्स्य अवतार (ii) कूर्म अवतार (iii) वराह अवतार (iv) सिंह अवतार (v) वामन अवतार
(vi) परशुराम अवतार (vii) राम अवतार (viii) कृष्ण अवतार (ix) बुद्ध अवतार (x) कल्कि अवतार।
इन दस अवतारों में प्रथम नौ अवतार हो चुके है जबकि अंतिम अवतार अर्थात कल्कि अवतार वर्तमान युग में अर्थात कलियुग में होना है।
मत्स्य से परशुराम तक के अवतार में आधुनिक विकासवाद के अनुसार मानव की उत्पति के विकास का एक क्रम दिखाई देता है। परशुराम के बाद भी यह विकास क्रम देखा जा सकता है। परशुराम मर्यादा पुरुष नहीं थे। राम मर्यादा पुरुष थे। परशुराम से राम का विकास अधिक है। राम से कृष्ण में कलात्मक विकास अधिक है। कृष्ण से बुद्ध में धार्मिक या करुणात्मक विकास अधिक है।
कल्कि अवतार में सभी अवतारों से अधिक शक्ति होगी। ऐसा कहा गया है।
अवतारवाद क्यों? : अवतारवाद को मानने के पीछे केवल निमित्तेश्वरवाद में विश्वास था। इस मतानुसार ईश्वर विश्वातीत है। ऐसी स्थिति में धार्मिक गतिविधियों की सार्थकता को बनाए रखने, धार्मिक व्यक्ति के संवेगों को संतुष्ट करने के लिए ईश्वर को धरती पर अवतरित होने
की कल्पना की गई, जिसे अवतार कहा गया।
ईश्वर जब अवतरित होता है तो ईश्वर के संदर्भ में कहा जाता है कि न तो आदि है, न मध्य है, न अंत है।
ईश्वर बनाम मनुष्य (God-Man Relation)
ईसाई मतानुसार ईश्वर ने अपने अनुरूप मानव को बनाया है। ईश्वर मनुष्य की श्रेष्ठ कृति है। मनुष्य ही धरती पर ईश्वर का वास्तविक उत्तराधिकारी है। ईश्वर ने मनुष्य की रचना सृष्टि को उदेश्यपूर्ण एवं सफल बनाने के लिए की है। अपनी विवेक बुद्धि के कारण मनुष्य अन्य प्राणियों में भिन्न एवं श्रेष्ठ है।
परन्तु संकल्प स्वातंत्र्य (Freedom or Will ) के दुरुपयोग के कारण वह दुःखों और कष्टों से युक्त है। ईश्वर की कृपा से ही मनुष्य दुःखों से दूर हो सकता है। ईश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिए धरती पर ईश्वर को प्रतिनिधि पोप के अनुसार आचरण करना आवश्यक है। इस संदर्भ में यहाँ बाइबिल में बताये गये मार्ग को ही ईश्वरीय कृपा प्राप्ति , दुःख के निदान एवं आनन्द की प्राप्ति का मार्ग माना गया है। इस मार्ग से अलग आचरण करने वाली लोगों को यहाँ अज्ञानी माना गया है। इस रूप में ईसाई मत यँहा धार्मिक व्यावर्तकवादी (Exclusivist) है। वे परम सत्ता तक पहुंचने के अनेक मार्ग न मानकर एक मार्ग स्वीकार करते है। इस्लाम धर्म में भी परम सत्ता तक पहुंचने का एक ही मार्ग स्वीकार किया गया है।
पाश्चात्य परंपरा में विभिन्न दार्शनिक विचारकों के भी मत में मनुष्य एवं ईश्वर के मध्य संबंध की विवेचना दिखाई देती है। जैसे- डेकार्ट; लाइबनित्ज आदि
डेकार्ट : डेकार्ट के अनुसार मनुष्य मन और शरीर का संयोग है और यह मन और शरीर दोनों अपनी सत्ता हेतु ईश्वर के ऊपर निर्भर है। इस रूप में यहाँ मनुष्य को ईश्वर सापेक्ष सत्ता के रूप में स्वीकार किया गया है।
स्पिनोजा:- इसके अनुसार ईश्वर और विश्व में अनिवार्य आंतरिक तादात्म्य संबंध है। ऐसी स्थिति में मनुष्य की सत्ता ईश्वर से पृथक रूप में स्थापित नहीं होती। मनुष्य ईश्वर के ही चित्त एवं अचित्त अंशों का योग है। ईश्वर और मनुष्य में आंतरिक संबंध है।
लाइबनित्ज : इसके अनुसार मनुष्य विभिन्न मोनेड़ो का समुच्चय है। शरीर के मोनेडों में कम मात्रा में चेतना है जबकि आत्मा में अधिक चेतन मोनेड़ है। इन विभिन्न मोनडों में ईश्वर ही सामंजस्य की स्थापना करता है। इस रूप में यहाँ लाइबनित्ज के दर्शन में भी यद्यपि मनुष्य को ईश्वर से पृथक, स्वतंत्र माना गया है, परन्तु उसे ईश्वर द्वारा प्रतिपादित पूर्व स्थापित सामंजस्य को नियम से संचालित माना गया है।
बर्कले:- बर्कले के दर्शन में आत्मा के ही रूप में ईश्वर और मनुष्य दोनों को स्वीकार किया गया है। ईश्वर असीमित आत्मा है जबकि मनुष्य को सीमित आत्मा के रूप में स्वीकार किया गया है।
भारतीय परंपरा : इस परंपरा में ईश्वर और मनुष्य के मध्य संबंध के दो रूप दिखाई देते हैं -
(1) ईश्वर साधन रूप में
(2) ईश्वर साधन और साध्य दोनों रूपों में।
योग एवं अद्वैत वेदान्त में ईश्वर की स्थिति साधन के रूप में दिखाई देती है। योग दर्शन में पुरुष व प्रकृति के मध्य संबंध की स्थापना हेतु ईश्वर को स्वीकार किया गया है। अद्वैत वेदान्त में निर्गुण निराकार परम तत्व का साक्षात्कार हेतु व्यवहारिक दृष्टिकोण से ईश्वर की सत्ता को स्वीकार किया गया है ताकि जीवों का नैतिक विकास एवं आध्यात्मिक उत्थान हो सके और वे परम तत्व ब्रह्म के साक्षात्कार के योग्य हो जाए।
रामानुज एवं मध्व आदि ईश्वर को चरम लक्ष्य के संदर्भ में साधन को साथ-साथ साध्य के रूप में भी स्वीकार करते हैं। ईश्वर के अनुरूप कार्य करने से (भक्ति प्रार्थना, उपासना) चरम लक्ष्य का मार्ग प्रशस्त होता है। यहाँ अंतिम स्तर (मोक्ष) पर भी ईश्वर की भक्ति की बात की गई है।
वेदान्त दर्शन में ईश्वर-जीव संबंध के संदर्भ में प्रधानतः तीन मत दिखाई देते हैं -
(1) शंकर के अनुसार : इनके अनुसार पारमार्थिक दृष्टिकोण से ब्रह्म ही एकमात्र सत है, जगत मिथ्या है, जीव मूलतः ब्रह्म ही है, ब्रह्म से भिन्न नहीं है. केवल अविद्या के कारण जीव की ब्रह्म से पृथक रूप में प्रतीति होती है इसलिए कहा गया है कि अविद्या निवृत्ति के पश्चात ब्रह्म की प्राप्ति कोई नवीन प्राप्ति नहीं है बल्कि यह प्राप्तस्य प्राप्ति है। यहां यह भी कहा गया है कि जो ब्रह्म को जानता है, वह ब्रह्म हो जाता है। इस प्रकार यहां ब्रह्म और जीव में अद्वैत संबंध माना गया है। यहां इस संदर्भ में यह कहा गया है कि अयम् आत्मा ब्रह्म अर्थात यह आत्मा ही ब्रह्म है। इस रूप में यहां दोनों में तादात्म्य संबंध स्वीकार किया गया है।
(2) रामानुज के अनुसार: रामानुज विशिष्टाद्वैतवाद के समर्थक है। इनका अनुसार ब्रह्म के चित्त एवं अचित्त रुपी सूक्ष्म अंशों का ही स्थूल रूप में रूपांतरण मनुष्य है। इस प्रकार यहां मनुष्य को ईश्वरीय अंश के रूप में स्वीकार किया गया है। वह ईश्वर से भिन्न है, परंतु वह पृथक एवं स्वतंत्र नहीं है।
(3) मध्वाचार्य के अनुसार: मध्वाचार्य द्वैतवाद के समर्थक है। इनके अनुसार ब्रह्म स्वतंत्र तत्व है। जबकि चित्त और अचित्त परतंत्र तत्व है। इस रुप में मनुष्य की सत्ता ईश्वर से भिन्न एवं पृथक हैं परन्तु उसकी ईश्वर से स्वतंत्र सत्ता नहीं है।
एक विशिष्ट सन्दर्भ:
जब मनुष्य मोक्ष की प्राप्ति करता है तो फिर वैसी स्थिति में ईश्वर और मनुष्य के बीच चार प्रकार की स्थितियां उभरती है-
(1) सारूप्य : मोक्ष प्राप्त जीव आकार एवं स्वरूप में ईश्वर के समान हो जाता है। गीता में मुक्त पुरुष का यही अवधारणा है।।
(2) सामीप्य : मोक्ष प्राप्त जीव ईश्वर की निकटता प्राप्त करता है। निम्बार्काचाार्य, मध्वाचार्य और वल्लभाचार्य की यही मान्यता है।
(3) सालोक्य: मुक्त जीव ईश्वर के प्रकाशमय लोक (बैकुण्ठ) को प्राप्त हो उसके साथ रहने लगता है। रामानुजाचार्य इसी मत के समर्थक हैं।
(4) सायुज्य : मुक्त जीव ईश्वर (ब्रहा) के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेता है। आचार्य शंकर इस मत के समर्थक हैं। उनके अनुसार ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म ही हो जाता है। आत्मा का अपने स्वरूप में अवस्थिति ही मोक्ष है।
कुछ अन्य पक्ष
एक धार्मिक प्रार्थना के क्रम में भक्त ईश्वर से यह भी कहता है कि- त्वमेव माता च पिता त्वमेव अर्थात हे ईश्वर तू ही मेरी माँ और तू मेरा पिता है।
गीता में श्रीकृष्ण का कथन है कि-'ममैवांशो जीवलोके जीवभूती सनातन' अर्थात् मेरा ही अंश जीव लोक में जीवात्मा के रूप में सनातन है।
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