ज्ञान मीमांसा से सम्बंधित प्रश्न
ज्ञानमीमांसा
1. निम्नलिखित युग्मों में से कौन-सा
एक सुमेलित युग्म नहीं है ?
(a) सत्ख्याति - रामानुज
(b) अख्याति - कुमारिल
(c) असत्ख्याति - शून्यवाद
(d) अन्यथाख्याति - न्याय
उत्तर-(b)
व्याख्या:-कुमारिल विपरीत ख्याति को मानते
हैं। इनके अनुसार भ्रम में दो भिन्न ज्ञानों के अंशों को मिलाकर एक कर दिया जाता
है। जबकि प्रभाकर अख्याति मानते हैं। अख्यातिवाद के अनुसार भ्रम में दो ज्ञानों का
आंशिक ग्रहण होता है। यह अज्ञान नहीं है, बल्कि अल्पज्ञान ह।
न्याय-अन्यथाख्यातिवाद, रामानुज-सत्ख्यातिवाद, शून्यवाद-असत्ख्यातिवाद।
2. निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म सुमेलित
नहीं है ?
(a) नागार्जुन
- बुद्धिस्ट
लॉजिक
(b) अन्नम् भट्ट-तर्क संग्रह
(c) गंगेश-तत्त्वचिन्तामणि
(d) वात्स्यायन - न्यायसूत्र भाष्य
उत्तर-(a)
व्याख्या–बुद्धिस्ट लॉजिक के लेखक
नागार्जुन नहीं हैं। इनकी रचनाएँ हैं-मूल माध्यमिक कारिका, विग्रहव्यावर्तिनी,
प्रज्ञापारमिता सूत्र आदि।
3. भ्रामक ज्ञान विषयक भारतीय
सिद्धान्त ख्यातिवाद कहे जाते हैं। ख्याति शब्द का अर्थ है-
(a) ज्ञान (b)
विरुद्ध ज्ञान (c) ज्ञान का अभाव (d)
मिथ्या ज्ञान
उत्तर-(a)
व्याख्या- भारतीय दर्शन में ख्याति
शब्द का अर्थ ज्ञान है। किन्तु ख्यातिवाद के नाम से भ्रम के सिद्धान्त की व्याख्या
भारतीय दर्शन में की गई है। अर्थात् 'भ्रमात्मक ज्ञान' ख्यातिवाद के नाम से जाना
जाता है।
4. सूची I का सूची II से मिलान कीजिए और नीचे दिये गए कूट
का प्रयोग करते हुए सही उत्तर चुनिए-
सूची। सूची ॥
A. अख्याति 1. न्याय
B. अन्यथाख्याति 2.
प्रभाकर
C.विपरीत
ख्याति
3. रामानुज
D. सत्ख्याति 4. कुमारिल
उत्तर-(b)
व्याख्या-सही सुमेल इस प्रकार है-
अख्याति प्रभाकर
अन्यथाख्याति न्याय
विपरीत ख्याति -कुमारिल
सत्ख्याति रामानुज
ज्ञानमीमांसा
5. सूची-1 (सिद्धान्त) को सूची-11 (दर्शन) के साथ सुमेलित कीजिए और
सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए-
सूची-। सूची-।I
(सिद्धान्त) (दर्शन)
A. ज्ञान आत्मा का आकस्मिक गुण है 1. न्याय
B. ज्ञान आत्मा का अनिवार्य गुण है 2. विशिष्टाद्वैत
C. ज्ञान आत्मा का स्वरूप है। 3. अद्वैत वेदान्त
D ज्ञान आत्मा का कर्म है 4. मीमांसा
कूट :
A B C D
(a) 1 2 3 4
(b) 3 1 4 2
(c) 1 2 4 3
(d) 3 4 2 1
उत्तर- (a)
व्याख्या-
ज्ञान आत्मा की क्रिया है-कुमारिल
न्याय वैशेषिक एवं प्रभाकर के अनुसार ज्ञान आत्मा का आगन्तुक गुण है
ज्ञान आत्मा का अनिवार्य गुण है-विशिष्टाद्वैत
अद्वैत वेदान्त के अनुसार ज्ञान आत्मा का स्वरूप है।
भारतीय दर्शन : आलोचन तथा अनुशीलन-चन्द्रधर शर्मा
6. भ्रामक ज्ञान विषयक भारतीय सिद्धान्त ख्यातिवाद कहे जाते हैं। 'ख्याति'
शब्द का अर्थ है-
(a) मिथ्या ज्ञान (b) ज्ञान का अभाव (c) ज्ञान (d) विरुद्ध ज्ञान
उत्तर-(c)
व्याख्या-भ्रम भारतीय ज्ञानमीमांसा का प्रमुख सिद्धान्त है। भारतीय दर्शन
के सभी ज्ञान-शास्त्री इसकी सत्ता स्वीकार करते हैं, परन्तु इसकी व्याख्या
भिन्न-भिन्न प्रकार से करते हैं। भारतीय ज्ञानशास्त्री भ्रम के कई नाम बतलाते हैं;
जैसे- भ्रम, भ्रांति, विपर्यय, ख्याति, अध्यास आदि। परन्तु इसका अधिक प्रचलित तथा
शास्त्रीय नाम ‘ख्याति' है। अतः भ्रम के सभी सिद्धान्त ख्यातिवाद कहलाते हैं,
परन्तु यहाँ एक कठिनाई है। 'ख्याति' शब्द का अर्थ है-ज्ञान, परंतु भ्रम तो ज्ञान
रूप नहीं है। यह तो ज्ञान का अभाव है। परन्तु ध्यान से देखने पर पता चलता है कि
ज्ञान भी दो प्रकार का होता है-यथार्थ (प्रमा) और अयथार्थ (अप्रमा)। इस प्रकार
स्पष्ट है कि भ्रम अप्रमा या अयथार्थ ज्ञान का एक प्रकार है, परन्तु प्रमा और अप्रमा
दोनों ज्ञान रूप ही है।
7. सूची-1 एवं सूची-II को सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे
दिये गये कूटों से सही उत्तर चुनिये-
सूची- सूची-11
(ख्याति)
(रज्जु सर्प भ्रम में सर्प का स्वरूप)
A. सर्प सर्वथा असत् है 1. अनिर्वचनीय ख्याति
B. सर्प आन्तरिक प्रत्यय है 2. अन्यथा ख्याति
C. सर्प वास्तविक है, किन्तु अन्यत्र है 3. असत् ख्याति
D. सर्प स्मृति रूप है 4. आत्म ख्याति
कूट:
A B C D
(a)
3 4 1 2
(b)
4 3 2 1
(c) 1 3 4
2
(d)
3 4 2
1
उत्तर-(d)
व्याख्या-शंकराचार्य के भ्रम विषयक मत को अनिर्वचनीय ख्यातिवाद कहा
जाता है। शंकर ने भ्रम या अभ्यास को परिभाषित करते हुए कहा है कि अध्यास 'स्मृतिरूप
परत्र पूर्वदृष्टावभास' है। अर्थात् अध्यास या भ्रम अवभास है और यह स्मृति रूप पूर्व
दृष्ट का अन्य में अवभास है। यह अवभास स्मृति तो नहीं है, किन्तु स्मृति के समान रूप
वाला है। भ्रम विषयक नैयायिकों का
सिद्धान्त अन्यथा ख्यातिवाद कहलाता है। यहाँ 'अन्यथा' का अर्थ है 'अन्यत्र' और
'अन्य रूप में' और ये दोनों अर्थ अन्यथा ख्याति में
चरितार्थ होते है। विज्ञानवाद के ख्यातिवाद को "आत्मख्याति' कहा जाता है विज्ञानवाद
के अनुसार बाह्य पदार्थ शश-श्रृंग और खपुष्प के समान नितान्त
असत् है। विज्ञान ही बाह्य पदार्थों का आकार लेकर बहिर्वत प्रतीत होते हैं।
रज्जु-सर्प के भ्रम में सर्प नामक बाह्य पदार्थ नहीं है, अपितु सर्पाकार विज्ञान
ही सर्प-पदार्थ के रूप में प्रतीत होता है। शून्यवाद के ख्यातिवाद को असत्
ख्यातिवाद माना जाता है। इसके अनुसार सब कुछ असत् है, सर्प सर्वथा असत् है।
स्रोत-प्रो. चन्द्रधर शर्मा
8. निम्नलिखित युग्मों में कौन-सा एक सही सुमेलित है?
(a) द्वैत अन्यथाख्यातिवाद
(b) न्याय-वैशेषिक सत्ख्यातिवाद
(c) अद्वैत वेदान्त अन्यथाख्यातिवाद
(d) विशिष्टाद्वैत अनिर्वचनीयख्यातिवाद
उत्तर- (a)
व्याख्या-भारतीय दर्शन में भ्रम के सिद्धान्त को ख्यातिवाद कहा गया है।
जो वस्तु वहाँ नहीं है उसी का प्रत्यक्ष करना भ्रम कहलाता है। भारतीय दार्शनिकों
में भ्रम की उत्पत्ति को लेकर मतभेद है और सभी ने अपने-अपने ढंग से व्याख्या की
है। जिसे विभिन्न नामों से विभूषित किया जाता है जो निम्नांकित है--
1. सत् ख्यातिवाद - रामानुज
2. असत् ख्यातिवाद - माध्यमिक शून्यवाद
3. आत्मख्यातिवाद - योगाचार विज्ञानवाद
4. अख्यातिवाद - मीमांसा (प्रभाकर)
5. विपरीतख्यातिवाद - कुमारिल भट्ट
6. अनिर्वचनीयख्यातिवाद - शंकराचार्य
7. अन्यथाख्यातिवाद - न्याय-वैशेषिक
8. विवेक ख्यातिवाद - सांख्य
9. प्रसिद्धार्थ ख्यातिवाद - चार्वाक
मध्वाचार्य का वेदान्त दर्शन द्वैत अर्थात् द्वैत-वेदान्त के नाम से
जाना जाता है। इसका भ्रम का सिद्धान्त एक प्रकार का अन्यथाख्यातिवाद कहा जाता है।
स्रोत-भारतीय दर्शन की रूपरेखा- प्रो० हरेन्द्र प्रसाद एवं दत्त एवं
चटर्जी
9. सूची-I (सिद्धान्त )को सूची-II (दर्शनशास्त्र) से सुमेलित
कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए-
सूची-। ( सिद्धान्त ) सूची-II ( (दर्शनशास्त्र)
A. अनिर्वचनीयख्याति 1. योगाचार
B. सत्ख्याति
2. नैय्यायिक
C. आत्मख्याति 3. विशिष्ट द्वैतवादी
D. अन्यथाख्याति 4. अद्वैतवादी
कूट :
A B C D
(a) 4 2 1 3
(b) 1 3 4 2
(c) 4 3 1 2
(d) 1 2 4 3
उत्तर (c) स्त्रोत-दार्शनिक निबन्ध-बंदिष्टे
10. निम्नलिखित में से कौन-सा एक युगल सही सुमेलित है?
A. मीमांसा अन्यथाख्याति
B. न्याय-वैशेषिक अख्याति
C, अद्वैत वेदान्त अनिर्वचनीय ख्याति
D. सांख्य सत्- असत् ख्याति
उत्तर- (c)
व्याख्या-भारतीय दर्शन में ख्यातिवाद को भ्रम सिद्धान्त के रूप में
जाना जाता है, जिनके रूप हैं-न्याय-अन्यथाख्यातिवाद, वेदान्त-अनिर्वचनीयख्यातिवाद, प्रभाकर
मीमांसा-अख्यातिवाद, कुमारिल मीमांसा - विपरीतख्यातिवाद। (स्रोत--बलदेव)
11. सूची-1 को सूची-2 के साथ सुमेलित कीजिए और सूचियों
के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए-
सूची-।
सूची-॥
A. न्याय 1. प्रामाण्यम् स्वत:
अप्रामाण्यम् परत
B. बौद्ध- दर्शन 2. प्रामाण्यम् स्वतः
अप्रामाण्यम् स्वत
C. सांख्य 3. अप्रामाण्यम् स्वतः
प्रामाण्यम् परत:
D. वेदान्त 4. प्रामाण्यम् परतः अप्रामाण्यम् परत.
कूट :
A B C D
(a) 2 3 4 1
(b) 4 1 2 3
(c) 2 1 4 3
(d) 4 3 2 1
उत्तर (d)
व्याख्या
A. न्याय 4. प्रामाण्यम् परतः
अप्रामाण्यम् परत.
B. बौद्ध- दर्शन 3. अप्रामाण्यम् स्वतः
प्रामाण्यम् परत
C. सांख्य 2. प्रामाण्यम् स्वतः
अप्रामाण्यम् स्वत:
D. वेदान्त 1. प्रामाण्यम् स्वत:
अप्रामाण्यम् परत
12. निम्नलिखित युग्मों में से कौन-सा सुमेलित नहीं है?
(a)
बौद्ध दर्शन : सामान्य सिवाय उन नामों के कुछ नहीं है जिनके विध्यात्मक
गुणार्थ होते हैं।
(b)
अरस्तू : एक सामान्य किसी स्वतन्त्र सत्ता का प्रतिनिधित्व नहीं करता
जो कि व्यक्ति (विशेषों) से भिन्न हैं
(c) न्याय-वैशेषिक : वही एक सामान्य एक
ही जाति के सभी व्यक्तियों (विशेषों) में अन्तर्निहित है।
(d) जैन दर्शन : सामान्य समान आवश्यक
गुणों के द्वारा सन्निहित होते हैं, वे गुण जो कि एक ही प्रकार के सभी विशेषों में
होते हैं
उत्तर-(a)
स्त्रोत-बलदेव उपाध्याय
13. निम्नलिखित में से कौन-सा सही ढंग से सुमेलित नहीं है ?
(a) न्याय - उपमान
(b) वैशेषिक - शब्द
(c) बौद्ध दर्शन - अनुमान
(d) मीमांसा - अनुपलब्ध
उत्तर-(b)
व्याख्या: भारतीय दर्शन में प्रमा के साधन के
रूप में दार्शनिकों को स्वीकार्य प्रमाण इस प्रकार हैं-
1. चार्वाक-प्रत्यक्ष
2 बौद्ध-प्रत्यक्ष, अनुमान
3. न्याय-प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान
4. वैशेषिक-प्रत्यक्ष, अनुमान
5. सांख्य योग-प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द
6. कुमारिल भट्ट (मीमांसा)-प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान, अर्थापत्ति,
अनुपलब्धि
7. प्रभाकर मित्र (मीमांसा)-प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान, अर्थापत्ति
8. शंकराचार्य-प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द उपमान, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि
9. रामानुज-प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द
स्रोत-डॉ. हरेन्द्र प्रसाद सिन्हा
14. “नास्तिको वेद निन्दकः” कथन के
अनुसार निम्नलिखित में से कौन-से दर्शन नास्तिक हैं ?
(a) मीमांसा,
जैन और सांख्य (b) जैन, वैशेषिक और योग
(c) चार्वाक,
जैन और बौद्ध. (d) चार्वाक, जैन और वेदान्त
उत्तर-(c)
व्याख्या-मनु ने नास्तिक की परिभाषा
देते हुए कहा, "नास्तिको वेद निन्दकः” अर्थात् नास्तिक वे हैं जो वेद की
निन्दा करते हैं। इसी आधार पर भारतीय दर्शन की परम्परा में छ: आस्तिक दर्शन
है—सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त; ये सभी वेदों को प्रमाण रूप
में मानते हैं तथा तीन नास्तिक दर्शन हैं—चार्वाक, जैन और बौद्ध; ये तीनों दर्शन
वेदों को प्रमाण नहीं मानते हैं।
15. भ्रम के सभी सिद्धान्तों में
निम्नलिखित में कौन सर्वगत विशेषता है:
(a) किसी
वस्तु में उस वस्तु का प्रत्यक्ष जो उसमें नहीं है
(b) कल्पित
वस्तु का प्रत्यक्ष
(c) असत्
वस्तु का प्रत्यक्ष
(d) सत् वस्तु का आंशिक प्रत्यक्ष
उत्तर-(a)
व्याख्या-सभी दर्शन भ्रम के सन्दर्भ
में यह मानते हैं कि भ्रम किसी वस्तु में उस वस्तु का प्रत्यक्ष है जो उसमें नहीं
है। शेष तीनों विकल्प भ्रम कैसे है इससे सम्बन्धित है जिस पर दर्शनों में मतभेद
है।
स्रोत-भारतीय दर्शन आलोचन और
अनुशीलन-सी.डी. शर्मा
16. परिभाषा की दृष्टि से नास्तिक कौन
है?
(a) जङवादी
(b) निरीश्वरवादी
(c) वेद
को न मानने वाला (d) कर्म को न मानने वाला
उत्तर-(c)
व्याख्या:- दार्शनिक दृष्टि से भारतीय दर्शन में
नास्तिक उसे कहा जाता है जो वेदों की प्रामाणिकता को नहीं मानता है। "नास्तिको
वेद निंदक:", वेदों की निंदा करने वाला नास्तिक है। स्रोत: भारतीय दर्शन की समीक्षात्मक
रूपरेखा -राममूर्ति
पाठक
17. निम्नलिखित युग्मों में से
कौन-सा सुमेलित नहीं है ?
(a) ज्ञाततावाद - कुमारिल
(b) त्रिपुटीप्रत्यक्षवाद
- प्रभाकर
(c) प्रत्यक्षवाद - चार्वाक
(d) वाह्य-प्रत्यक्षवाद
- माध्यमिक शून्यवाद
उत्तर-(d)
व्याख्या-कुमारिल ज्ञाततावाद को
मानते हैं। इसके अनुसार किसी पदार्थ का ज्ञान होने पर उसमें ज्ञातता धर्म उत्पन्न
होता है। अर्थात ज्ञातता शक्ति से ज्ञाता को यह ज्ञान होता है कि यह पदार्थ ज्ञाता
को ज्ञात हो गया है।
प्रभाकर का मत त्रिपुटीप्रत्यक्षवाद
कहा जाता है। इसके अनुसार ज्ञान ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान तीनों को एक साथ प्रकाशित
करता है। चार्वाक इन्द्रिय प्रत्यक्ष को ज्ञान का स्रोत मानते हैं। माध्यमिक
शून्यवाद बाह्य प्रत्यक्षवाद को नहीं मानते और प्रत्यक्ष की केवल निर्विकल्प
अवस्था को स्वीकार करते हैं। वाह्य प्रत्यक्षवाद वैभाषिकों का मत है।
18. निम्न युग्मों में से कौन-सा
सुमेलित नहीं है?
(a) अन्यथाख्यातिवाद
- न्याय-वैशेषिक (b) विपरीतख्यातिवाद - कुमारिल
(c) असत्ख्यातिवाद
- माध्यमिक
शून्यवाद (d) अख्यातिवाद
- योगाचार
विज्ञानवाद
उत्तर-(d)
व्याख्या-अख्याति प्रभाकर की है।
योगाचार विज्ञानवाद आत्मख्याति को मानता है। ख्यातिवाद भ्रम सिद्धान्त है। शंकर की
अनिर्वचनीय ख्याति, रामानुज सत् ख्याति, प्रभाकर अख्याति, कुमारिल विपरीत ख्याति
और न्याय अन्यथाख्याति, को मानता है।
19. सूची-1 को सूची-II के साथ सही सुमेलित कीजिए और
सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए-
सूची-। सूची-II
A. भ्रम
वस्तु का बोध है, जैसी वह है उससे अन्य रूप में देखना 1. प्रभाकर मीमांसक
B. रजत
के भ्रम में, रजत का जैसा संज्ञान होता है वह न तो यथार्थ, न अयथार्थ, न ही
दोनों वास्तविक हैं अथवा अवास्तविक 2. न्याय
C. सीप
का टुकड़ा जो हम देखते है और रजत जिसकी स्मृति हमें है, उसका भेद हम नहीं देखते और गलती से
हम कहते है, 'यह रजत है' 3 अद्वैत वेदान्त
उत्तर (c) A-2, B-3, C-1
20. निम्नलिखित में से जो जोड़ा
संगत है, उसका निर्देश कीजिए-
(a) अहं-ब्रह्मास्मि-गौतम (b) तत् त्वम् असि-जैमिनी (c) निष्काम
कर्म-प्रभाकर (d) आत्मदीपो भव-बुद्ध
उत्तर-(d)
व्याख्या-शंकर के दर्शन में आत्मा
और ब्रह्म में कोई भेद नहीं किया गया है। शंकर आत्मा और ब्रह्म के ऐक्य की 'तत्
त्वम् असि' से पुष्टि करते है। उपनिषद् के
वाक्य 'अहं ब्रह्मास्मि' से भी आत्मा और ब्रह्म के अभेद का ज्ञान होता है। निष्काम
कर्म का उपदेश गीता में दिया गया है जबकि महात्मा बुद्ध ने अपने शिष्यों को आत्म-निर्भर
रहने को प्रोत्साहित किया है। उन्होंने 'आत्मदीपो भव' (आप ही अपना प्रकाश बनो) का
उपदेश देकर शिष्यों को स्वयं प्रकाश खोजने का आदेश दिया है।
21. सूची-I (सम्प्रत्यय) को सूची-II (दर्शन) से सुमेलित कीजिए और
सूचियों के नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए-
सूची-। (सम्प्रत्यय)
सूची ॥ (दर्शन)
A. ज्ञानलक्षण
प्रत्यक्ष 1.
बौद्ध-दर्शन
B.विवर्त 2. न्याय
C. स्वरूपभूत
ज्ञान 3. अद्वैत वेदान्त
D.
प्रतीत्य समुत्पाद 4.
विशिष्टाद्वैत वेदान्त
कूट
A B C D
(a)
4 3 2 1
(b)
2 3 4 1
(c)
3 1 4 2
(d)
2 4 1 3
उत्तर-(b)
स्रोत-भारतीय दर्शन-बलदेव उपाध्याय
22. सूची-1 (कथन) को सूची ।।
(सिद्धान्त) से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही
उत्तर चुनिए-
सूची-। (कथन) सूची-॥ (सिद्धान्त)
A. प्रतिभासिक
विषय का प्रत्यक्ष किसी विशेष इन्द्रिय-विषय सम्बन्ध द्वारा होता है। 1
अन्यथा ख्याति
B. प्रतिभासिक
विषय का प्रत्यक्ष किसी इन्द्रिय-विषय सम्बन्ध के बिना होता है 2 आत्मख्याति
C. प्रतिभासिक
विषय की सत्ता भ्रम में ही रहती है 3. अनिर्वचनीय-ख्याति
D. तथाकथित
भ्रम एकल संज्ञान रूप नहीं है 4. अख्याति
कूट:
A B C D
(a)
4 3 2 1
(b)
2 3 4 1
(c)
3 1 4 2
(d)
2 4 1 3
उत्तर-(d)
स्रोत-दार्शनिक निबन्ध-बंदिष्टे
23. निम्नलिखित में से जो जोड़ा संगत है, उसका निर्देश कीजिए-
(a) अनुमान - चार्वाक
(b) उपमान - न्याय
(c) अनुपलब्धि - न्याय
(d) बहिरंग साधन - सांख्य
उत्तर-(b)
व्याख्या:- चार्वाक के अनुसार प्रत्यक्ष ही एकमात्र प्रमाण है। चार्वाक अनुमान
प्रमाण का खंडन करता है। न्याय-दर्शन के अनुसार प्रमा
के चार भेद है:- प्रत्यक्ष, अनुमिति,शाब्द और उपमिति। प्रत्यक्ष प्रमा
का प्रमाण प्रत्यक्ष, अनुमिति प्रमा का
प्रमाण अनुमान, शाब्द प्रमा का प्रत्यक्ष
शब्द और उपमिति प्रमा का प्रमाण उपमान माना जाता हैं। इस प्रकार न्याय-दर्शन के अनुसार प्रमाणों की
संख्या चार हैं। प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द और उपमान। अनुपलब्धि को
न्याय दर्शन में प्रमाण नहीं माना गया है। इस प्रकार स्पष्ट है कि युग्म (b) संगत है
24. निम्नलिखित में से जो जोड़ा
संगत है, उसका निर्देश कीजिए-
(a) योगज प्रत्यक्ष-न्याय
(c) आरम्भवाद-सांख्य
(b) परिणामवाद-न्याय
(d) सामान्य-योग
उत्तर (a)
व्याख्या-न्याय दर्शन में
प्रत्यक्ष प्रमाण का विभाजन दो वर्गों में हुआ हैं (I) लौकिक प्रत्यक्ष और (2) अलौकिक प्रत्यक्ष जब इंद्रिय का वस्तु के साथ
साधारण सम्पर्क होता है तब, उस प्रत्यक्ष को लौकिक प्रत्यक्ष कहते हैं, जबकि
इन्द्रियों का विषयों के साथ जो असाधारण सम्बन्ध होता है उसे अलौकिक प्रत्यक्ष
कहते हैं। अलौकिक प्रत्यक्ष तीन प्रकार का होता है (।) सामान्य लक्षण (2) ज्ञान लक्षण
और (3) योगज। योगज प्रत्यक्ष मुख्यतः योगियों में पाया जाता है। इन लोगों ने
योगाभ्यास द्वारा इस ज्ञान को अपनाया है। इस प्रकार स्पष्ट हैं कि युग्म (a) संगत है।
25. निम्नलिखित में से जो जोड़ा संगत है, उसका निर्देश कीजिए-
(a) विवर्त-रामानुज
(b) आसन एवं प्राणायाम-पतंजलि
(c) प्रत्यभिज्ञा-पतंजलि
(d) अध्यास-कुमारिल
व्याख्या-चितवृत्तियों के निरोध
के लिए योग-दर्शन प्रणीत साधना-पद्धति में आठ सोपान है। इसीलिए इसे 'अष्टांग योग
मार्ग' कहते हैं। इसके ये आठ अंग निम्नलिखित है-यम, नियम, आसन, प्राणायाम,
प्रत्याहार धारणा, ध्यान और समाधि। इनमें से प्रथम दो यम और नियम नैतिक साधना पर
बल देते हैं। आसन, प्राणायाम और
प्रत्याहार का उद्देश्य चित्त को बाह्य विषयों से हटाना है। धारणा, ध्यान और समाधि एकाग्रता के
विभिन्न रूप है और उनका लक्ष्य चित्त का निरोध करना है। अतः स्पष्ट है कि युग्म (b) संगत है।
26. सूची-1 को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिए और सूचियों
के नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए-
सूची-I सूची-II
A. प्रत्यक्ष, इन्द्रिय और पदार्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न निर्भ्रान्त संज्ञान है 1.विश्वनाथ
B. प्रत्यक्ष ऐसा अपरोक्ष ज्ञान है जो किसी अन्य ज्ञान से निगमित नहीं
होता 2.प्रभाकर
C. प्रत्यक्ष अपरोक्ष बोध है। 3. दिङ्गनाग
D. प्रत्यक्ष में कोई भी विचार संरचनाएँ नहीं होती। 4.गौतम
कूट:
कूट:
A B
C D
(a)
4 1 2
3
(b)
2 3 4
1
(c)
4 3 2
1
(d)
2 1 4
3
उत्तर-(a)
व्याख्या-विश्वनाथ ने प्रत्यक्ष
को इस प्रकार परिभाषित किया है-ज्ञानाकरणकं ज्ञानम् प्रत्यक्षम् अर्थात् प्रत्यक्ष
वह अपरोक्ष ज्ञान है जो ज्ञानान्तरजन्य नहीं है। प्रभाकर के अनुसार 'साक्षात्
प्रतीतिः प्रत्यक्षम्' अर्थात् प्रत्यक्ष अपरोक्ष ज्ञान है। गौतम के अनुसार
इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्य ज्ञानम् प्रत्यक्षम्' अर्थात् इन्द्रिय और पदार्थ के
सन्निकर्ष से उत्पन्न निर्भ्रान्त ज्ञान प्रत्यक्ष है। स्त्रोत-भारतीय दर्शन :
आलोचन और अनुशीलन-सी० डी० शर्मा, द्वितीय संस्करण, पृष्ठ-177, 196
27. सूची-1 को सूची-II के साथ सुमेलित कीजिए और सूचियों
के नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए-
सूची-I सूची-II
(सिद्धान्त) प्रणाली
A. स्वसंवेदना 1. अद्वैत वेदान्त
B. अनुव्यवसाय 2 बौद्ध-दर्शन
C. ज्ञातलिंगानुमेय 3, न्याय-वैशेषिक
D. स्वयंप्रकाश 4. पूर्व-मीमांसा
कूट:
A B
C D
(a)
1 4 3
2
(b)
2 3 4
1
(c)
1 3 4
2
(d)
2 4 3
1
उत्तर-(b)
व्याख्या-न्याय वैशेषिक परत: प्रामाण्यवाद
को मानते हैं। उनके अनुसार अनुव्यवसाय में ज्ञान का ज्ञान होता है तत्पश्चात्
ज्ञान के प्रमाण अथवा अप्रमाण का प्रश्न उठता है। उनके अनुसार यदि ज्ञान यथार्थ है
तो प्रामणिक और अयथार्थ है तो अप्रामाणिक। इस परीक्षण का साधन सफल प्रवृत्ति
सामर्थ्य है।
ज्ञातलिंगानुमेय पूर्व मीमांसक कुमारिल
का ज्ञान विषयक सिद्धान्त है। उनके अनुसार ज्ञान का अनुमान ज्ञातता के आधार पर
किया जाता है। किसी पदार्थ का ज्ञान होने पर उस पदार्थ में 'ज्ञातता' नामक धर्म का
उदय होता है अर्थात् वह पदार्थ ज्ञाता द्वारा ज्ञात हो चुका है, इसकी प्रतीति होती
है। अद्वैत वेदान्त के अनुसार ज्ञान स्वयं प्रकाश होता है। वह ज्ञाता पर निर्भर नहीं
है कि वह अपनी इच्छानुसार किसी वस्तु को जाने या अन्यथा न जाने या जाने।
28. निम्नलिखित में से कौन-सा एक
वाद सत्य के संसक्तता सिद्धान्त को मानता है?
(a)प्रत्ययवाद (b) अनुभववाद (c) वस्तुवाद (d) प्रतिनिधानवाद
उत्तर-(a)
व्याख्या-पाश्चात्य प्रत्ययवादी
दार्शनिकों का ज्ञान विषयक सिद्धान्त 'संसक्तता (Coherence
Theory)' कहलाता है। इसके अनुसार तत्त्व का स्वरूप विशिष्टाद्वैत
है, जिसमें विभिन्न अंग परस्पर भिन्न होते हुए भी एकता के सूत्र में बंधे होते
हैं। अंगी तत्त्व के इन विभिन्न अंगों में जितनी अधिक संसक्तता होगी वे अंग उतने
ही सत्य होंगे। इस सिद्धान्त में तत्त्व और सत्य के बीच 'डिग्रीज ऑफ रियलिटी एण्ड ट्रुथ'
की कल्पना की गई है।
स्रोत-भारतीय दर्शन : आलोचन और
अनुशीलन-सी० डी० शर्मा, द्वितीय संस्करण, पृष्ठ-195
29. निम्नलिखित में से कौन-सा एक
सिद्धान्त 'ज्ञान के लिए ज्ञान' के आदर्श को स्वीकार नहीं करता?
(a) सत्य का संवादिता सिद्धान्त
(b) सत्य का संसक्तता सिद्धान्त
(c) सत्य का अर्थक्रियापरक सिद्धान्त
(d) सत्य का समधिकता सिद्धान्त
उत्तर-(c)
व्याख्या-सत्य के सम्बन्ध में
व्यावहारिकतावाद ने यह घोषित किया है कि सत्य कोई निरपेक्ष और अपरिवर्तनशील
अवधारणा नहीं है। फिर सत्य किसी निरपेक्ष अनुभूति या ज्ञान का गुण-धर्म भी नहीं
है। यह तो मानव ज्ञान और मानव अनुभूति का गुण-धर्म है और पूर्णत: सापेक्ष है तथा परिवर्तनशील
है। एक क्षेत्र में तथा एक सन्दर्भ में जो ज्ञान सत्य है वह दूसरे क्षेत्र और
दूसरे सन्दर्भ में असत्य भी हो सकता है। इसका आदर्श ज्ञान के लिए ज्ञान नहीं अपितु
ज्ञान व्यावहारिकता के लिए है।
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